Sawan 2023: शिव-पार्वती ने 11 हजार साल तक यहां किया तप, चिंतामणि गिरने के कारण कहलाया मणिकरण, जानें कहानी
Published by : Sanjay Singh Updated At : 10 Jul 2023 10:00 AM
सावन के पहले सोमवार पर देशभर में शिवालयों में बम-बम भोले की गूंज है. लोग जलाभिषेक के लिए कतारों में खड़े हैं. काशी विश्वनाथ सहित सभी प्रमुख शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए विशेष इंतजाम किए गए हैं. इन्हीं में से एक कुल्लू के मणिकरण शिव मंदिर में लोग बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं.
Sawan 2023: सावन के पहले सोमवार पर देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी हुई है. भगवान शंकर का जलाभिषेक करने के लिए काशी विश्वनाथ सहित प्रमुख शिवालयों में विशेष इंतजाम किए गए हैं. इन्हीं में से एक है मणिकरण तीर्थ शिव मंदिर. मणिकरण हिमाचल प्रदेश में कुल्लू के भुंतर से उत्तर-पश्चिम में पार्वती घाटी में व्यास और पार्वती नदियों के मध्य बसा एक तीर्थस्थल है.
मणिकरण तीर्थ का धर्मशास्त्रों में हरिहर, अर्द्धनारीश्वर, चिंतामणि नाम से जिक्र है. सावन में यहां जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है. यूपी सहित अन्य स्थानों से बड़ी संख्या में लोग यहां दर्शन पूजन के लिए आते हैं. धार्मिक मान्यता के मुताबिक यहां पर भगवान शंकर ने माता पार्वती के साथ 11 हजार वर्ष तक तप किया. एक दिन जल क्रीड़ा करते समय माता पार्वती की चिंतामणि गिर पड़ी, जो पाताल में शेषनागजी के पास पहुंची.
— sanjay singh (@sanjay_media) July 10, 2023
भगवान शंकर ने गणों को माता पार्वती का गहना चिंतामणि तलाश करने की आज्ञा दी. चिंतामणि के नहीं मिलने पर उनके नेत्रों से नैना देवी प्रकट हुईं. नैना देवी ने पाताल में जाकर शेषनागजी को मणि लौटाने को कहा. इस पर उन्होंने अपनी फुंकार से अनेक मणियों के साथ चिंतामणि भेंट कर दी. तब से इस स्थान का नाम मणिकरण पड़ गया. कहा जाता है कि शेषनागजी की फुंकार से इस स्थान पर गर्म पानी के स्रोत का निर्माण हुआ, जो आज तक कायम है.
नदी के बर्फीले पानी के बीच गर्म पानी का स्रोत किसी आश्चर्य से कम नहीं है. मंदिर की विशेषता है कि यहां मुख्य शिवलिंग के साथ भगवान शंकर और माता पार्वती का विग्रह भी है, जिनकी प्रतिदिन पूजा अर्चना होती है. वहीं बाहर विशालकाय नंदी विराजमान हैं. सावन के दौरान यहां दूर-दूर से शिवभक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए पहुंचते हैं. वहीं मुख्य शिवलिंग के करीब परिसर में दूसरी शिवलिंग है, जिसके करीब जाते ही पैरों में तपिश महसूस होने लगती है. यहां ज्यादा देर तक खड़े रहने संभव नहीं है.
परिसर में ही त्रिशूलधारी भगवान शंकर की विशालकाय प्रतिमा है. इसके करीब गर्म पानी के दो स्रोत हैं, जिनमें श्रद्धालु डोर से सफेद कपड़े की पोटली को डुबोकर चावल पकाते हैं. इसकी विशेष मान्यता है. इसके लिए श्रद्धालुओं की भीड़ दोनों गर्म स्रोत को चारों तरफ से घेरे रहती है. पके हुए चावल को भगवान का प्रसाद माना जाता है.
इस ठंडे-उबलते प्राकृतिक संतुलन ने वैज्ञानिकों को लंबे समय से चकित कर रखा है. कहा जाता है कि यहां के पानी में रेडियम है. देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं. विशेष रूप से चर्म रोग, गठिया की समस्या से ग्रसित लोगों को यहां आने से काफी लाभ होता है. माना जाता है कि यहां गंधकयुक्त गर्म पानी में कुछ दिन स्नान करने से उनकी बीमारी ठीक हो जाती है. वहीं कहा जाता है कि इस पानी से अगर चाय बनाई जाए तो सामान्य पानी की चाय से आधी चीनी डालकर भी दोगुना मीठी हो जाती है.
मणिकरण तीर्थ की विशेषता इसे लेकर हिंदुओं के साथ सिखों की आस्था है. दरअसल मणिकरण शिवमंदिर और यहां स्थापित गुरुद्वारा एक ही परिसर में स्थित है. गुरु नानक देव 1574 विक्रम संवत को भाई बाला और मर्दाना के साथ मणिकरण पहुंचे थे. इस दौरान मर्दाना को भूख लगी. उनके पास सिवाय आटे के कुछ नहीं था. उन्होंने गुरु नानक देव से आग और बर्तन का कोई साधन नहीं होने की बात कही.
इस पर गुरु नानक देव ने उनसे वहां एक पत्थर हटाने को कहा. पत्थर हटाने पर वहां खौलते हुए पानी का स्रोत प्रकट हुआ. गुरु नानक देव ने रोटियां बनाकर खोलते हुए पानी में डाल देने को कहा. ऐसा करने पर सभी रोटियां डूब गईं. इस पर मर्दाना ने कहा कि थोड़ा सा आटा था, वह भी चला गया.
इस पर गुरु नानक देव ने मर्दाना से एक रोटी भगवान के नाम पर भेंट करने की बात कही. ऐसी अरदास करते ही सभी पकी हुई रोटियां ऊपर आ गईं. उस भोजन को करके मर्दाना तृप्त हुए. गुरु नानक देव ने मर्दाना को इस स्थान को सतयुगी बताया. बाद में गुरु गोविंद सिंह ‘पंज प्यारों’ के साथ मणिकरण आए थे.
1940 में संत बाबा नारायण हरि को यहां गुरु नानक देव के दर्शन हुए थे. उन्हीं के हुक्म से यहां लंगर शुरू हुआ, जो आज तक चल रहा है. खास बात है कि गुरु नानक देव द्वारा प्रकट किए गए गर्म जल के स्रोत में ही ये लंगर पकता है. यहां लंगर के लिए इसी गर्म पानी का इस्तेमाल किया जाता है.
लखनऊ से मणिकरण दर्शन के लिए परिवार सहित पहुंचे जगदीश कुमार और प्रीति ने बताया कि इस क्षेत्र की सुंदरता जहां अद्भुत है, वहीं यहां से जुड़ी मान्यता और भी प्रबल है. नदी के ठंडे पानी के बीच गर्म पानी की मौजूदगी को देखकर बेहद आश्चर्य हुआ. दो धर्मों से जुड़ी मान्यताएं इसे और भी खास बनाती हैं. यूपी के साथियों से यहां के बारे में पता चला तो आने से रोक नहीं पाए. अब लगातार आने की इच्छा है. यूपी के अलावा कई राज्यों के लोग यहां पहुंचते हैं.
मणिकरण से 39 किलोमीटर दूर स्थित बिजली महादेव मंदिर भी बेहद अद्भुत है. इसका नाम यहां होने वाले चमत्कार के कारण पड़ा. स्थानीय लोगों के मुताबिक हर 12 साल में इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर बिजली गिरती है और यह शिवलिंग कई टुकड़ों में टूट जाता है. इसके बाद मंदिर के पुजारी शिवलिंग को मक्खन से जोड़ देते हैं और कुछ समय बाद यह अपने पुराने स्वरुप में आ जाता है. इसी वजह से इसे बिजली महादेव कहा जाता है.
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लेखक के बारे में
By Sanjay Singh
working in media since 2003. specialization in political stories, documentary script, feature writing.
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