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Rourkela News : रेलनगरी बंडामुंडा में शिक्षा की अलख जगा रहीं दिव्यांग रीना रॉय

Updated at : 05 Sep 2024 12:31 AM (IST)
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Rourkela News : रेलनगरी बंडामुंडा में शिक्षा की अलख जगा रहीं दिव्यांग रीना रॉय

Rourkela News : बंडामुंडा के डी केबिन की दिव्यांग बेटी रीना रॉय ने 45 प्रतिशत से अधिक नि:शक्त होने के बावजूद बतौर शिक्षिका अंचल में अपनी विशेष पहचान बनायी है.

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Rourkela News : अगर हौसले बुलंद हों, तो कोई भी बाधा किसी को मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती. ऐसा ही कुछ कर दिखाया है रेलनगरी बंडामुंडा के डी केबिन की दिव्यांग बेटी रीना रॉय ने. उन्होंने विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए शिक्षा के क्षेत्र में जिले में अपना मुकम्मल स्थान बनाया है. रीना 45 प्रतिशत से अधिक नि:शक्त होने के बावजूद बतौर शिक्षिका अंचल में शिक्षिका की लौ जला रही हैं. रीना एक ऐसी शिक्षिका हैं, जिन्होंने दिव्यांगता को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया है. जानकारी के अनुसार, वे पिछले 10 साल से बिसरा के एक निजी स्कूल में पढ़ा रही थीं. पहले बिसरा में स्कूल जाने के लिए दिव्यांग रीना घर से एक साइकिल के सहारे दो किलोमीटर मुख्य सड़क पर जाती थीं. इसके बाद स्कूल वैन से आठ किलोमीटर की दूर तय कर बिसरा स्थित स्कूल पहुंचती थीं. वर्तमान बंडामुंडा के एक निजी स्कूल में बतौर शिक्षिका वे एक साल से सेवा दे रही हैं. अपने काम के प्रति लगन व निष्ठा के कारण रोजाना समय पर स्कूल पहुंचने वाली रीना से स्कूल के प्राचार्य सहित दूसरे शिक्षक भी बेहद प्रभावित हैं.

दिव्यांग रीना दूसरों के लिए पेश कर रहीं मिसाल

‘जहां चाह, वहीं राह’ की कहावत को शिक्षिका रीना ने सच साबित कर दिखाया है. रीना के इस दृढ़ संकल्प ने समाज ही नहीं, बल्कि दिव्यांग लोगों के लिए एक मिसाल कायम की है. जो लोग अपनी दिव्यांगता को कमजोरी मानते हुए हार मान जाते हैं. उनके लिए रीना उदाहरण हैं. रीना पैर से दिव्यांग होने के बाद भी छात्रों में शिक्षा की अलख जला रही हैं और दूसरे शिक्षकों के लिए मिसाल पेश कर रही हैं.

पिता से मिली हार नहीं मानने की सीख

रीना बताती हैं कि उनके पिता सेवानिवृत्त रेलकर्मी सकलदीप राय ने उन्हें बचपन से सिखाया कि जीवन में कैसी भी परिस्थिति हो, हार नहीं माननी चाहिए. वे आज भी अपने पिता की सीख को आगे बढ़ा रही हैं. वे स्कूल में पढ़ाने को नौकरी मानती ही नहीं हैं. वे कहती हैं कि मेरे मन में इस बात का संतोष है कि मुझे जो ज्ञान मिला है, उसे मैं बच्चों में बांट रहीं हूं. मेरे पिता, राधास्वामी इंग्लिश स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल और मेरे पति पप्पू कुमार ने सदैव मुझे आगे बढ़ाने में मदद की है.

बचपन से ही जुझारू रही हैं रीना रॉय

मां सुशीला देवी बताती हैं कि रीना बचपन से ही जुझारू रही हैं. उन्होंने कभी भी किसी बात को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया. उसे पता है कि वह क्या कर रही है और क्या करना चाहिए. इसलिए हम उसकी हौसला अफजाई करते हैं. उसे कभी पढ़ने से नहीं रोका. 2002 में रीना ने बंडामुंडा के राधा स्वामी इंग्लिश मीडियम स्कूल से मैट्रिक, 2004 में बंडामुंडा कास्ट कॉलेज से आर्ट्स में 12वीं एवं 2007 में राउरकेला सरकारी ऑटोनोमस कॉलेज से राजनीति विज्ञान में ऑनर्स के साथ ग्रेजुएशन पूरी की. इसके बाद से ही रीना शिक्षिका बनकर क्षेत्र में शिक्षा की लौ जला रही हैं. रीना के साथ उनके छात्रों का एक अलग तरह का लगाव है. स्कूल के अलावा भी जब छात्रों को किसी तरह की शिक्षण संबंधी परेशानी होती है, तो वे रीना के पास आकर मदद लेते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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