जब डिजाइनिंग के विद्यार्थी बने छऊ शिल्पकार, सरायकेला में सात दिन सीखा मुखौटा बनाने का हुनर
विद्यार्थियों को मुखौटा बनाने की कला सीखते गुरु सुशांत महापात्र
एनआईएफडी के छात्रों ने गुरु सुशांत महापात्र से सरायकेला छऊ मुखौटा निर्माण की पारंपरिक बारीकियां सीखीं. जानें कैसे आधुनिक डिजाइन और कला का हुआ संगम.
खरसावां: मिट्टी और कागज की परतों से आकार लेता चेहरा, आंखों और भौंहों की बारीक बनावट, चेहरे पर उभरती भाव-भंगिमा और फिर रंगों की परत. देखते ही देखते निर्जीव आकार सरायकेला छऊ के किसी पात्र का रूप ले लेता है. इन दिनों इसी हुनर को करीब से समझने के लिए नई दिल्ली से आये फैशन डिजाइनिंग के विद्यार्थी सरायकेला के शिल्पकारों के साथ बैठकर छऊ मुखौटा निर्माण की बारीकियां सीख रहे हैं.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन डिजाइनिंग (एनआइएफडी), नई दिल्ली के विद्यार्थियों ने सात दिनों तक संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित छऊ मुखौटा शिल्पकार गुरु सुशांत कुमार महापात्र से पारंपरिक तकनीक का प्रशिक्षण लिया. युवा छऊ मुखौटा शिल्पकार सुमित महापात्र ने भी विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया.
मिट्टी से मुखौटे तक, खुद आजमाया हुनर

प्रशिक्षण के दौरान विद्यार्थियों को मुखौटा निर्माण की पूरी प्रक्रिया समझायी गयी. प्रारंभिक स्वरूप तैयार करने, मिट्टी से आकार देने, चेहरे की बनावट उभारने, सतह को चिकना करने के बाद रंग-रूप और सजावट की प्रक्रिया से उन्हें अवगत कराया गया. विद्यार्थियों ने खुद भी अलग-अलग चरणों में हाथ आजमाये. इससे उन्हें पारंपरिक शिल्प की जटिलता और इसमें लगने वाले धैर्य का प्रत्यक्ष अनुभव मिला.
रंग-रेखा ही बताती है पात्र की पहचान
गुरु सुशांत कुमार महापात्र ने विद्यार्थियों को बताया कि छऊ मुखौटा महज चेहरे को ढकने वाला आवरण नहीं है. यह मंच पर पात्र की पहचान और व्यक्तित्व को उभारने का महत्वपूर्ण माध्यम है. अलग-अलग पात्रों के अनुसार मुखौटे का आकार, आंखों की बनावट, भौंहों की आकृति, रंग और सजावट तय होती है. सुमित महापात्र ने निर्माण की व्यावहारिक बारीकियों से विद्यार्थियों को परिचित कराया.
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डिजाइन की पढ़ाई को परंपरा से जोड़ा
आधुनिक डिजाइन की दुनिया से आये विद्यार्थियों के लिए यह प्रशिक्षण कक्षा से अलग अनुभव रहा. रंग, आकृति, बनावट और सजावट की पारंपरिक समझ को उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से जाना. पारंपरिक छऊ शिल्प और आधुनिक डिजाइन के बीच यह संवाद विद्यार्थियों को नयी रचनात्मक संभावनाओं से भी परिचित करा रहा है.
नयी पीढ़ी तक पहुंच रही छऊ की विरासत

सरायकेला छऊ को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में स्थान प्राप्त है. ऐसे में डिजाइन विद्यार्थियों का स्थानीय शिल्पकारों से सीधे प्रशिक्षण लेना परंपरा के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है. इससे एक ओर विद्यार्थियों को सरायकेला की सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझने का अवसर मिला, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक मुखौटा निर्माण की तकनीक नयी पीढ़ी तक पहुंच रही है. मिट्टी, कागज, रंग और सजावट से तैयार मुखौटा किस तरह मंच पर किसी पात्र की पहचान बन जाता है, विद्यार्थियों ने इसे प्रशिक्षण के दौरान करीब से महसूस किया.
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