रांची की इमाम कोठी में दफन है मोहब्बत की एक कब्र, दूसरी आज भी खाली, जानें क्या है राज
रांची के कोकर स्थित सर सैयद अली इमाम की कब्र और दूसरी पत्नी के लिए बनवाई गई खाली कब्र. फोटो: प्रभात खबर
रांची की इमाम कोठी सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि एक अधूरी प्रेम कहानी का गवाह है. यहां सर सैयद अली इमाम की कब्र के पास एक कब्र आज भी खाली है, जो उनकी पत्नी के लिए बनवाई गई थी. जानें क्यों पूरी न हो सकी यह मोहब्बत.
रांची से अभिषेक आनंद की रिपोर्ट
Ranchi Untold Story: झारखंड की राजधानी रांची के कोकर स्थित इमाम कोठी यानी अनीस कैसल अपनी भव्य वास्तुकला और करीब एक सदी पुराने इतिहास के लिए प्रसिद्ध है. लेकिन इसकी सबसे भावुक पहचान मुख्य इमारत से कुछ दूरी पर बने उस मकबरे से जुड़ी है, जहां दो कब्रें मौजूद हैं. इनमें एक कब्र में ब्रिटिश दौर के चर्चित बैरिस्टर और राजनेता सर सैयद अली इमाम दफन हैं, जबकि दूसरी कब्र आज भी खाली है. यह खाली कब्र उनकी पत्नी अनीस फातिमा के लिए बनवाई गई थी, लेकिन सर सैयद अली इमाम की अंतिम इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकी.
पत्नी के नाम पर बनवाया था अनीस विला

सर सैयद अली इमाम ने अपनी पत्नी अनीस फातिमा के प्रति गहरे प्रेम और सम्मान के प्रतीक के रूप में रांची में एक भव्य विला बनवाया था, जिसे उस समय अनीस विला कहा जाता था. बाद में यही इमारत अनीस कैसल और इमाम कोठी के नाम से मशहूर हो गई. कहा जाता है कि दोनों के बीच इतना गहरा लगाव था कि उन्होंने जीवन के साथ-साथ मृत्यु के बाद भी एक-दूसरे के करीब रहने की इच्छा जताई थी. इसी भावना के तहत परिसर में एक मकबरा बनवाया गया, जिसमें दो कब्रों की व्यवस्था की गई.
एक इच्छा जो अधूरी रह गई

31 अक्टूबर 1932 को सर अली इमाम का रांची में निधन हो गया. उनकी इच्छा के अनुरूप उन्हें इमाम कोठी परिसर में बने मकबरे में दफनाया गया. उनकी कब्र आज भी उसी स्थान पर मौजूद है और इतिहास की गवाह बनी हुई है. लेकिन दूसरी कब्र, जो अनीस फातिमा के लिए तैयार की गई थी, कभी आबाद नहीं हो सकी. उनका अंतिम समय पटना में बीता और निधन के बाद उन्हें वहीं सुपुर्द-ए-खाक किया गया. इस तरह मृत्यु के बाद भी साथ रहने की दोनों की ख्वाहिश अधूरी रह गई.
दो कब्रें, दो अलग कहानियां

आज मकबरे में आमने-सामने बनी ये दोनों कब्रें एक पूरी और एक अधूरी कहानी का एहसास कराती हैं. एक कब्र में सर अली इमाम की अंतिम मंजिल है, जबकि दूसरी कब्र उस इंतजार की प्रतीक बन चुकी है, जो कभी खत्म नहीं हुआ. यही वजह है कि इमाम कोठी का यह मकबरा रांची के सबसे भावनात्मक ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है.
कभी 21 एकड़ में फैला था पूरा परिसर

आज भले ही इमाम कोठी का मूल परिसर करीब तीन एकड़ तक सिमट गया हो, लेकिन एक समय यह लगभग 21 एकड़ में फैला हुआ था. परिसर में विशाल बगीचे, आम और लीची के सैकड़ों पेड़ और हरियाली से घिरा वातावरण इसकी खास पहचान हुआ करता था. तीन मंजिला इस इमारत में करीब 120 कमरे थे. इसका निर्माण वर्ष 1913 में शुरू हुआ और लगभग दो दशक बाद, 1932 के आसपास पूरा हुआ.
वक्त के साथ बदल गया इमाम कोठी का चेहरा

समय बीतने के साथ इमाम कोठी का बड़ा हिस्सा अलग होता गया और यह निजी संपत्ति में बदल गया. मुख्य भवन का जीर्णोद्धार तो किया गया, लेकिन मकबरे का हिस्सा लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रहा. आज इसके आसपास आधुनिक इमारतें और कॉर्पोरेट कार्यालय खड़े हैं. तेजी से बदलते रांची के बीच यह मकबरा अब भी उस दौर की निशानी बनकर खड़ा है, जब प्रेम की याद में एक साथ दो कब्रें बनाई गई थीं.
इतिहास में दर्ज है अधूरी मोहब्बत

इमाम कोठी की सबसे बड़ी कहानी इसकी भव्य इमारत नहीं, बल्कि वही दो कब्रें हैं. एक कब्र प्रेम की मंजिल है, तो दूसरी अधूरी ख्वाहिश की पहचान. शायद इसी वजह से रांची का यह ऐतिहासिक स्थल आज भी लोगों को यह एहसास कराता है कि साथ जीने की चाहत पूरी हो सकती है, लेकिन हर मोहब्बत को साथ दफन होने का मुकम्मल अंजाम नहीं मिलता.
सर सैयद अली इमाम से जुड़े तथ्य
- जन्म: पटना के नेओरा में 11 फरवरी 1869 को.
- 1890: कलकत्ता हाई कोर्ट में स्टैंडिंग काउंसल नियुक्त.
- 1908: ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष.
- 1908: सरकार की जनरल काउंसिल के विधि सदस्य.
- 1910: पटना हाई कोर्ट के जज नियुक्त.
- 1917: बिहार और उड़ीसा सरकार की कार्यकारी परिषद के सदस्य.
- 1918: हैदराबाद के निजाम की सरकार की कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष.
- 1919: लीग ऑफ नेशंस की पहली बैठक में प्रथम भारतीय प्रतिनिधि.
- 1932: अक्टूबर में निधन.
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