दो माह तक 3000 जवानों ने की घेराबंदी, आखिर पकड़ा गया बेसरा

बेसरा (हरा गमछा) व मोछू (पीला गमछा) की गिरफ्तारी के बाद की तस्वीर
सुरक्षा एजेंसियों ने 2 महीने की सटीक रणनीति और 3000 जवानों की घेराबंदी के बाद भाकपा माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा को गिरफ्तार किया है. गुप्त अभियान और सटीक खुफिया तालमेल की यह मिसाल है. यह गिरफ्तारी दो महीने की कड़ी मशक्कत और योजना का परिणाम है, जिसमें सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को भनक तक नहीं लगने दी.
रांची से आनंद मोहन-पंकज त्रिपाठी की रिपोर्ट
भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के लिए सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस ने सटीक रणनीति बनायी. उनकी दो महीने की सब्र भरी रणनीति सटीक खुफिया तालमेल की मिसाल है. बताया जा रहा है कि करीब दो महीने पहले सारंडा और कोल्हान के जंगलों में सुरक्षा बलों ने करीब 3000 जवानों के साथ मिसिर बेसरा को घेर लिया था. लेकिन इसके बाद भी वह अपने दो-चार साथियों की छोटी टुकड़ी के साथ वहां से निकल भागने में कामयाब रहा.
इसकी जानकारी पुलिस और खुफिया एजेंसियों को मिल गयी थी, लेकिन उन लोगों ने नक्सलियों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी. रणनीति के तहत सुरक्षा बलों ने सारंडा-कोल्हान इलाके में अभियान पहले की तरह ही जारी रखा. जिससे कि संगठन और मिसिर के समर्थकों को यह भरोसा बनारहे कि पुलिस अब भी उसी क्षेत्र में उसे तलाश रही है. इसी बीच गिरिडीह-धनबाद के इलाके में बिलकुल गुपचुप तरीके से एक समानांतर अभियान शुरू कर दिया गया, जिसकी भनक खुद स्थानीय पुलिस बल के बड़े हिस्से को भी नहीं थी.
ऐसे बच रहा था मिसिर बेसरा
हर दो दिन में बदलता रहता था ठिकाना कभी किसी रिश्तेदार या करीबी के घर को ठिकाना नहीं बनाया नक्सल प्रभावित रहे पारसनाथ के गांवों में पुराने समर्थकों के सहारे छिपा रहा पुराने नक्सली प्रशांत बोस के दौर में आंदोलन से लाभान्वित हुए ग्रामीणों के घरों को चुना फोन का उपयोग नहीं करता था, सर्विलांस से लोकेशन का नहीं चल रहा था पता हर दो दिन में वह ठिकाना बदल लेता था, ताकि किसी को शक न हो
वाहन में पांच लोग सवार थे सभी ने चादर ओढ़ रखी थी
28 जुलाई की शाम करीब 4:30 बजे पुलिस को सूचना मिली कि पश्चिमी सिंहभूम में अभियान से बचकर माओवादी नेता मिसिर बेसरा अपनेतीन-चार साथियों के साथ गिरिडीह की ओर जाने वाला है. इस सूचना पर एसपी (ग्रामीण) एस मोहम्मद याकूब के नेतृत्व में दो टीम बनायी गयी. एक टीम ने सड़क पर वाहनों की जांच शुरू की. दूसरी टीम सुरक्षा कवच के रूप में तैनात की गयी.
शाम करीब 6:15 बजेसंयुक्त टीम ने बेंहाचिया श्मशान घाट के समीप नाकेबंदी कर वाहनों की जांच शुरू की. रात करीब 8:10 बजे चिरकुंडा की ओर से आ रही एक मिनी वैन को रोकने पर चालक ने भागने की कोशिश की. इसके बाद जवानों ने वाहन को घेर लिया. वाहन में पांच लोग सवार थे, सभी ने चादर ओढ़ रखी थी. पुलिस नेतलाशी ली, तो बीच की सीट पर बैठे तीन लोगों के शरीर से एके-47 राइफलें बंधी मिलीं. तीनों ने हथियार संभालने की कोशिश की, लेकिन जवानों ने पांचों को काबू कर गिरफ्तार कर लिया.
न खुद फोन रखा, न किसी और का इस्तेमाल किया
मिसिर बेसरा न खुद मोबाइल रखता था, न दूसरों के फोन से बात करता था, जिससे सर्विलांस के जरिये उसका लोकेशन ट्रेस करना मुश्किल हो रहा था. खुफिया एजेंसियां गांवगांव जाकर पुराने समर्थकों को टटोलती रहीं. सरेंडर कर चुके नक्सलियों से भी इनपुट लेने की कोशिश हुई, लेकिन शुरू में बड़ी सफलता नहीं मिली.
तीन दिन पहले उसका एक बॉडीगार्ड पुलिस के हत्थे चढ़ गया और अंत में सरेंडर कर दिया. उसके बाद इसे लेकर ही सुरक्षा बल टारगेटेड जगह पर गये. कुछ नये सोर्स की जानकारी ली और अंत में सभी जानकारी के आधार पर पिन प्वाइंटेड अभियान चलाया. देर शाम धनबाद के बरवड्डा जंगल क्षेत्र से मिसिर को गिरफ्तार कर लिया गया. मौके पर वह एक किराये की गाड़ी से धनबाद की ओर जा रहा था.
पारसनाथ के गांवों में बदलता रहा ठिकाना
सारंडा से निकलने के बाद मिसिर बेसरा सीधे गिरिडीह के पारसनाथ इलाके में पहुंच गया, जो कभी नक्सल आंदोलन का गढ़ रहा था. यहां उसने कभी किसी रिश्तेदार या करीबी के घर को ठिकाना नहीं बनाया, बल्कि पुराने नक्सली प्रशांत बोस के दौर में आंदोलन से लाभान्वित हुए आम ग्रामीण परिवारों के घरों को चुना. हर दो दिन में वह ठिकाना बदल लेता था, ताकि किसी को शक न हो.
सरेंडर के लिए लगातार दबाव बनाया, फिर भी नहीं झुका
खुफिया एजेंसियां मिसिर पर लगातार सरेंडर का दबाव बनाती रहीं. उसके पुराने सहयोगियों और रिश्तेदारों तक संदेश पहुंचाया गया, लेकिन वह हर बार प्रस्ताव ठुकराता रहा. आखिरकार एजेंसियों ने उसे जिंदा पकड़ने के लिए जाल बिछाया और गिरिडीह के गुपचुप अभियान व सारंडा में जारी दबाव की दोहरी रणनीति 28 जुलाई को रंग लायी. मिसिर बेसरा और उसके साथियों को धनबाद के बरवड्डा जंगल क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया गया.
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लेखक के बारे में
By भूमि शर्मा
भूमि शर्मा पिछले दो वर्षों से डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल के साथ बतौर कंटेंट राइटर जुड़ी हुई हैं. वर्तमान में वह मुख्य रूप से जमशेदपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों की खबरों को कवर करती हैं. इससे पहले वह एजुकेशन बीट और झारखंड बीट पर भी काम कर चुकी हैं, जहां उन्होंने शैक्षणिक बदलावों और राज्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर लेखन किया है।
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