झारखंड में 'रैट फीवर' का कोहराम, बच्चों पर मंडराया खतरा, रांची सदर अस्पताल के उपाधीक्षक ने बताया बचाव के उपाय
झारखंड में बढ़ रहा है 'लेप्टोस्पायरोसिस' का खतरा, Pic Credit- Ai, Only for Symbolism
झारखंड में लेप्टोस्पायरोसिस, जिसे 'रैट फीवर' भी कहते हैं, बच्चों के लिए गंभीर खतरा बन गया है. रांची के अस्पतालों में इसके बढ़ते मामलों को देखते हुए डॉक्टरों ने चिंता जताई है. जानें इस संक्रामक बीमारी के लक्षण, फैलाव और बचाव के आसान उपाय.
रांची से अभिषेक आनंद की रिपोर्ट
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रांची: झारखंड में इन दिनों एक खतरनाक संक्रामक बीमारी 'लेप्टोस्पायरोसिस' (जिसे आम भाषा में 'रैट फीवर' कहा जाता है) तेजी से पांव पसार रही है. इंसानों में चूहों के जरिए फैलने वाले इस बैक्टीरियल इंफेक्शन की चपेट में सबसे ज्यादा बच्चे आ रहे हैं. रांची के प्रसिद्ध रानी चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल में ही अगस्त माह में 129 से ज्यादा पीड़ित बच्चे इलाज के लिए भर्ती हो चुके हैं. डॉक्टरों के अनुसार, 8 महीने से लेकर 16 वर्ष तक के बच्चे इससे सर्वाधिक प्रभावित हो रहे हैं. रानी चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल के डॉ. राजेश के मुताबिक, कई बच्चों में इंफेक्शन फेफड़ों और दिमाग तक पहुंच जाने के कारण उन्हें आईसीयू में भर्ती करने की नौबत आ रही है.
कैसे फैलता है यह संक्रमण?
लेप्टोस्पायरोसिस 'लेप्टोस्पाइरा' (Leptospira) नामक बैक्टीरिया से होता है, जो संक्रमित चूहों और अन्य जानवरों के यूरिन (पेशाब) में पाया जाता है. बारिश के दिनों में बिलों में पानी भर जाने के कारण चूहे बाहर निकल आते हैं. जब वे सार्वजनिक स्थानों, मिट्टी या ठहरे हुए पानी में पेशाब करते हैं, तो बैक्टीरिया जल और मिट्टी को दूषित कर देता है. यह बैक्टीरिया नमी वाली जगह में महीनों जिंदा रह सकता है. बच्चों के नंगे पैर पानी या कीचड़ में खेलने, हाथ-पैर में लगे छोटे कट या घाव, अथवा आंख, नाक व मुंह के जरिए यह शरीर में प्रवेश कर जाता है.
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सदर अस्पताल के उपाधीक्षक ने दी अहम जानकारी
इस गंभीर मुद्दे पर रांची जिला सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. विमलेश कुमार से खास बातचीत की गई. उन्होंने बीमारी के लक्षण, जांच और इसके इलाज को लेकर कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं. उन्होंने बताया कि इसके शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार, बदन दर्द, सिरदर्द और आंखों का लाल होना शामिल है. यदि स्थिति गंभीर होती है, तो मरीज को पीलिया (Jaundice), किडनी फेलियर, ब्लीडिंग और मेनिनजाइटिस (दिमागी बुखार) जैसी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है. डॉ विमलेश ने इस बीमारी की पुष्टि के लिए कौन जांच कराना चाहिए, इसके बारे में जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि लेप्टोस्पायरोसिस बीमारी का पता लगाने के लिए खून की आईजीएम (IgM) एंटीबॉडी जांच या पीसीआर (PCR) टेस्ट कराया जाता है, तभी इसकी सटीक जानकारी मिलती है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इससे डरने की जरूरत नहीं है. क्योंकि यह पूरी तरह क्यूरेबल (इलाज योग्य) बीमारी है. सदर अस्पताल में इसके इलाज की पूरी व्यवस्था है. चूंकि यह बैक्टीरियल इंफेक्शन है, इसलिए इसके इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाएं (जैसे डॉक्सीसाइक्लिन, सेफ्ट्रियाक्सोन और पेनिसिलिन जी) सदर अस्पताल में पूरी तरह से मुफ्त उपलब्ध हैं.
डॉक्टरों की सलाह: खुद से न लें दवा
डॉ विमलेश ने प्रभात खबर से बातचीत के दौरान उन्होंने इस बीमारी को लेकर चेतावनी भी दी है और इसे नजर अंदाज न करने की सलाह दी है. उन्होंने कि शुरुआत में इसका लक्षण डेंगू, टाइफाइड या सामान्य वायरल फीवर जैसे प्रतीत होता है, जिससे पहचान में देरी हो सकती है. डॉक्टरों ने अभिभावकों से अपील की है कि बच्चों को गंदे या ठहरे हुए पानी में खेलने न दें. लक्षण दिखने पर खुद से कोई दवा न लें और तुरंत नजदीकी अस्पताल में डॉक्टर से परामर्श कर जांच कराएं.
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