छोटानागपुर के जंगलों में गूंजती भारतीय सिनेमा की अमर दास्तान

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जानें कैसे झारखंड के जंगल और संस्कृति ने सत्यजीत राय, हेमेन गांगुली जैसे दिग्गजों की फिल्मों को प्रेरित किया. केचकी संगम से मैक्लुस्कीगंज तक, सिनेमाई यात्रा की अनूठी कहानी.

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जेब अख्तर की रिपोर्ट

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Jharkhand in Indian Cinema: ऋत्विक घटक के बाद यदि किसी फिल्मकार ने झारखंड के जंगलों और पहाड़ों को भारतीय सिनेमा की स्मृति में स्थायी रूप से दर्ज किया, तो वे थे सत्यजीत राय. फर्क सिर्फ इतना था कि ऋत्विक घटक इस भूगोल में मनुष्य और समाज के संघर्ष को तलाशते थे जबकि सत्यजीत राय ने इन्हीं जंगलों में आधुनिक मनुष्य के भीतर छिपे 'अरण्य' (जंगल) को देखा. यही कारण है कि झारखंड उनकी फिल्मों के लिए महज एक लोकेशन नहीं रहा, बल्कि उनकी सिनेमाई भाषा का अभिन्न हिस्सा बन गया. 

जब केचकी संगम और बेतला में ठहरे 'मानवीय संबंध'

वर्ष 1969 में सत्यजीत राय अपनी ऐतिहासिक फिल्म 'अरण्येर दिनरात्रि' के लिए एक ऐसी जगह की तलाश में थे, जहां जंगल केवल पेड़ों का समूह न होकर एक मनःस्थिति का विस्तार लगे. उनकी यह खोज पलामू के केचकी संगम और बेतला के जंगलों पर जाकर पूरी हुई. चार शहरी युवकों की कहानी पर आधारित इस फिल्म में जंगल उन्हें प्रकृति से अधिक अपने भीतर उतरने के लिए विवश करता है. सत्यजीत राय ने पलामू के जंगलों को केवल फिल्माया नहीं, बल्कि उन्हें कथा का एक मौन पात्र बना दिया.

सिनेमाई संस्कृति के आधारस्तंभ: हेमेन गांगुली

झारखंड और बंगाली सिनेमा का रिश्ता सिर्फ शूटिंग तक सीमित नहीं रहा. इसे मजबूती देने में निर्माता हेमेन गांगुली की भूमिका अग्रणी रही. प्लाजा सिनेमा, रतन टॉकीज, रूपाश्री और रूपाश्री इंटरनेशनल के माध्यम से उन्होंने लंबे समय तक रांची को पूर्वी भारत के प्रमुख फिल्म केंद्र के रूप में स्थापित रखा. उनकी बहुचर्चित फिल्म ''सगीना महतो'' और उसका हिंदी रूपांतरण ''सगीना'' छोटानागपुर के श्रमिक जीवन और उनके अधिकारों के संघर्ष से प्रेरित थी.

रांची में जन्मे बंशी चंद्रगुप्ता ने गढ़ी दृश्य-भाषा

भारतीय सिनेमा के महानतम आर्ट डायरेक्टरों में शुमार बंशी चंद्रगुप्ता का जन्म रांची में ही हुआ था. सत्यजीत राय की कालजयी फिल्मों पाथेर पांचाली, जलसाघर, चारुलता और अरण्येर दिनरात्रि की अविस्मरणीय दृश्य-भाषा व सेट डिजाइनिंग को गढ़ने में उनकी निर्णायक भूमिका रही.

मैक्लुस्कीगंज का सन्नाटा और 'ए डेथ इन द गंज'

समय के साथ झारखंड व बंगाली सिनेमा का यह अटूट रिश्ता और गहरा हुआ. वर्ष 1999-2000 में अपर्णा सेन अपनी चर्चित फिल्म ''परमितार एक दिन'' के निर्माण के लिए रांची पहुंचीं. फिल्म के अहम दृश्य हिनू और मैक्लुस्कीगंज में फिल्माए गये. मैक्लुस्कीगंज की खामोशी, एंग्लो-इंडियन संस्कृति और उसकी उदास सुंदरता को अपर्णा सेन ने जिस संवेदनशीलता के साथ कैमरे में उतारा, वह फिल्म की आत्मा बन गया. आगे चलकर कोंकणा सेन शर्मा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गयी फिल्म 'ए डेथ इन द गंज' का निर्माण किया.

'एक डॉक्टर की मौत' में दिखा तंत्र का संवेदनहीन चेहरा

दिग्गज निर्देशक तपन सिन्हा ने अपनी कालजयी फिल्म ''एक डॉक्टर की मौत'' के कई महत्वपूर्ण हिस्सों की शूटिंग रांची में की. रामपद चौधुरी की कहानी ''अभिमन्यु'' पर आधारित यह फिल्म भारत में टेस्ट-ट्यूब बेबी तकनीक के जनक डॉ सुभाष मुखोपाध्याय के जीवन संघर्ष पर आधारित थी. पंकज कपूर व शबाना आजमी के अभिनय से सजी इस फिल्म में रांची सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि अकेलेपन, व्यवस्था की उपेक्षा और संवेदनहीनता का एक जीवंत दृश्य रूप बनकर उभरता है.

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