Teacher’s Day 2026: झारखंड के वो शिक्षक, जिन्होंने हालात से हार नहीं मानी, बंद स्कूल से National Award तक की कहानी

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शिक्षक दिवस 2026

झारखंड के कुछ ऐसे शिक्षकों की प्रेरणादायक कहानियां पढ़ें जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी बच्चों के जीवन को बदला. जानें कैसे इन्होंने शिक्षा में नवाचार लाकर बदलाव की मिसाल कायम की.

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रांची: शिक्षक दिवस सिर्फ शिक्षकों को सम्मान देने का दिन नहीं, बल्कि उन कहानियों को याद करने का भी अवसर है, जहां किसी शिक्षक ने बच्चों की जिंदगी बदलने के लिए किताबों से आगे बढ़कर काम किया. झारखंड में भी ऐसे कई शिक्षक हैं, जिन्होंने संसाधनों की कमी, पिछड़े इलाकों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा की तस्वीर बदलने की कोशिश की. किसी ने बंद पड़े स्कूल में बच्चों को जुटाया, तो किसी ने खनन क्षेत्र के वंचित बच्चों के लिए पढ़ाई को आसान और रोचक बनाया.

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धनबाद की मुनमुन भट्टाचार्जी को मिला राष्ट्रीय सम्मान

झारखंड के लिए शिक्षक दिवस 2026 की सबसे बड़ी उपलब्धियों में धनबाद की मुनमुन भट्टाचार्जी का नाम प्रमुख है. धनबाद के बरमसिया स्थित सरकारी मध्य विद्यालय की प्रधानाध्यापिका मुनमुन भट्टाचार्जी का चयन राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए हुआ है. वह इस साल झारखंड से राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार पाने वाली एकमात्र शिक्षिका हैं. 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उन्हें सम्मानित करेंगी.

मुनमुन भट्टाचार्जी ने कोयला खदानों के आसपास रहने वाले वंचित समुदायों के बच्चों के लिए शिक्षा को उनकी जरूरतों के मुताबिक सरल और रचनात्मक बनाने पर काम किया. उन्होंने फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरसी (FLN), कला आधारित शिक्षण और अन्य नवाचारों को अपनाया. विशेष जरूरत वाले बच्चों को शिक्षा से जोड़ने पर भी उनका जोर रहा. उनके प्रयासों से बच्चों को पढ़ाई के साथ अपनी प्रतिभा और हुनर दिखाने के अवसर मिले.

बंद स्कूल से 300 बच्चों तक पहुंची बिनेश्वर कुमार की कहानी

चतरा के शिक्षक बिनेश्वर कुमार की कहानी भी बताती है कि एक शिक्षक की कोशिश किसी पूरे गांव की तस्वीर बदल सकती है. वर्ष 2001 में जब उनकी पोस्टिंग हेसातु गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई, तब स्कूल बंद पड़ा था और वहां कोई बच्चा पढ़ने नहीं आता था.

बिनेश्वर कुमार ने हार नहीं मानी. वह रोज घर-घर जाते और अभिभावकों से बच्चों को स्कूल भेजने की अपील करते. धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ने लगी और आज उसी स्कूल में करीब 300 बच्चे पढ़ रहे हैं. गांव के लोग उन्हें प्यार से 'छोटे सर' कहने लगे.

उनके काम को राज्य स्तर पर भी सम्मान मिला. 2022 में उन्हें उत्कृष्ट शिक्षक पुरस्कार दिया गया था और पुरस्कार के रूप में मिली एक लाख रुपये की राशि को भी उन्होंने स्कूल और बच्चों की सुविधाओं पर खर्च कर दिया.

देवघर की श्वेता शर्मा ने पढ़ाई में जोड़ा झारखंड का रंग

देवघर की शिक्षिका श्वेता शर्मा ने भी नवाचार के जरिए सरकारी स्कूल के बच्चों को बेहतर सीखने का अवसर दिया. उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया था. वह झारखंड की उस साल की एकमात्र राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षिका थीं.

श्वेता शर्मा ने बच्चों को पढ़ाने के लिए खेल और गतिविधि आधारित तरीकों को अपनाया. उनका खास नवाचार 'अबुआ जादुई पिटारा' रहा, जिसमें झारखंड की स्थानीय संस्कृति और कला को सीखने की सामग्री से जोड़ा गया. इसमें सोहराय कला, देवघर की चित्रकला और पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे स्थानीय तत्वों को शामिल किया गया.

कोविड काल में भी उन्होंने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए 'कॉपी एक्सचेंज प्रोग्राम' शुरू करने में भूमिका निभायी. उनके काम में सामुदायिक भागीदारी और बच्चों की बुनियादी पढ़ने-लिखने तथा गणितीय क्षमता मजबूत करने पर विशेष जोर रहा.

जब शिक्षक सिर्फ पढ़ाता नहीं, बच्चों का भविष्य बनाता है

झारखंड में इन शिक्षकों की कहानियां अलग-अलग इलाकों और परिस्थितियों से आती हैं, लेकिन इनके काम में एक समानता दिखाई देती है. इन्होंने बच्चों को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें स्कूल से जोड़ने, सीखने में रुचि पैदा करने और उनकी प्रतिभा को सामने लाने की कोशिश की.

राज्य में शिक्षा सुधार के लिए चलाए गए 'ज्ञान सेतु' जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य भी बच्चों को उनकी वास्तविक सीखने की क्षमता के स्तर से जोड़ना रहा है. झारखंड एजुकेशन प्रोजेक्ट काउंसिल के अनुसार, कार्यक्रम के शुरुआती छह महीनों में अधिकांश दक्षताओं में करीब 12 फीसदी सुधार दर्ज किया गया था और इससे शिक्षकों की रुचि व प्रेरणा बढ़ने की बात भी सामने आयी थी.

शिक्षक दिवस पर असली सम्मान यही

शिक्षक दिवस पर मंच से मिलने वाला सम्मान कुछ घंटों का हो सकता है, लेकिन एक शिक्षक द्वारा किसी बच्चे में जगाया गया आत्मविश्वास पूरी जिंदगी साथ रहता है. झारखंड के इन शिक्षकों की कहानियां यही बताती हैं कि स्कूल की इमारत, किताब और संसाधन जरूरी हैं, लेकिन बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी है एक ऐसा शिक्षक, जो उनके सपनों पर भरोसा करे.

मुनमुन भट्टाचार्जी को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार मिलना, बिनेश्वर कुमार का बंद स्कूल को फिर बच्चों से भर देना और श्वेता शर्मा का स्थानीय संस्कृति को पढ़ाई से जोड़ना इसी बदलाव की अलग-अलग तस्वीरें हैं. शिक्षक दिवस पर ऐसे शिक्षकों को याद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इनके प्रयासों का असर सिर्फ एक कक्षा तक नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता है.

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