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झारखंड के सरकारी स्कूलों में बेटियां और निजी में बेटे ज्यादा, जानें जानकारों की नजर में क्या है इसका मतलब

Updated at : 24 Jan 2022 6:36 AM (IST)
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झारखंड के सरकारी स्कूलों में बेटियां और निजी में बेटे ज्यादा, जानें जानकारों की नजर में क्या है इसका मतलब

आकड़ों के मुताबिक निजी स्कूलों में छात्र ज्यादा व सरकारी स्कूलों में छात्राएं ज्यादा पढ़ रही है. जानकारों का कहना है कि लोग लड़के बच्चों में पढ़ाई का खर्च ज्यादा उठा रहे हैं.

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रांची : सरकारी स्कूलों में नामांकित विद्यार्थियों में से जहां छात्राओं की संख्या अधिक है, वहीं निजी स्कूलों में इसके विपरीत छात्रों की संख्या अधिक है. केंद्र सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के सरकारी स्कूलों में कक्षा एक से 12वीं तक में कुल 4710525 विद्यार्थी हैं, जिनमें 2457762 छात्राएं और 2252763 छात्र नामांकित हैं. सरकारी स्कूलों में छात्रों की तुलना में 204999 छात्राएं अधिक नामांकित हैं.

वहीं, मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों में कक्षा एक से 12वीं तक में 1285232 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं. यहां छात्रों की संख्या 723472 है, वहीं छात्राओं की संख्या 561760 है. छात्रों की तुलना में छात्राओं की संख्या 161712 कम है. इधर, सरकारी सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में भी छात्राओं की संख्या अधिक है. यहां छात्रों की तुलना में 22380 अधिक छात्राएं नामांकित हैं.

सरकारी विद्यालय कुल : 4710525

2252763 छात्राएं

निजी विद्यालय

छात्र – 723472

छात्राएं- 561760

कुल : 1285232

पास करने में छात्रों से आगे हैं छात्राएं

स्कूलों में नामांकन के साथ-साथ एक से दूसरी कक्षा में प्रमोशन रेट में राज्य की छात्राएं , छात्रों से आगे हैं. केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक से लेकर हाइस्कूल तक में प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में प्रमोशन दर छात्राओं की अधिक है.

प्रमोशन रेट

कक्षा एक से पांच

छात्र 92.2

छात्राएं 94.4

कक्षा छह से आठ

छात्र 90.6

छात्राएं 91.7

कक्षा नौ व दस

छात्राएं: 81.9

कक्षा एक से पांच

छात्र 7.4

छात्राएं 5.3

कक्षा से आठ

छात्र 8.8

छात्राएं 7.7

कक्षा नौ व दस

छात्र 16.4

छात्राएं 17.0

कक्षा बढ़ने के साथ छूटने लगता है स्कूल

राज्य के सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले छात्राओं की संख्या छात्रों से अधिक है. लेकिन कक्षा बढ़ने के साथ ही इस संख्या का अंतर कम होने लगता है. राज्य में कक्षा बढ़ने के साथ छात्राओं का ड्रॉप आउट रेट बढ़ने लगता है. प्लस टू तक आते-आते छात्राओं का ड्रॉप रेट छात्रों से अधिक हो जाता है.

इस आंकड़े का मतलब यह है
लड़कों की पढ़ाई पर ज्यादा खर्च कर रहे अभिभावक

राज्य के सरकारी स्कूलों में छात्राओं का और निजी स्कूलों में छात्रों का नामांकन अधिक होना इस बात को दर्शाता है कि सामाजिक स्तर पर अभी तक लड़कों और लड़कियों में भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. निजी स्कूल अधिकतर शहरी क्षेत्रों में संचालित हैं. ऐसे में अगर शहरी क्षेत्र के सरकारी स्कूलों में पढ़नेवाले विद्यार्थियों में भी छात्राओं की संख्या अधिक है.

तो यह पुख्ता तौर पर कहा जा सकता है कि लोग लड़कों की पढ़ाई पर अधिक खर्च कर रहे हैं. कक्षा बढ़ने के साथ छात्राओं का ड्रॉपआउट रेट बढ़ने में पारिवारिक जिम्मेदारी और घरेलू काम प्रमुख कारण हो सकते हैं. पारिवारिक परिवेश भी इसका एक कारण है. घर से विद्यालय दूर होने की स्थिति में लड़कियों की सुरक्षा भी आगे पढ़ाई में बाधक बनती है.

डॉ सोना झरिया मिंज, कुलपति सिदो-कान्हू विवि दुमका

Posted By : Sameer Oraon

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