झारखंड के हाइस्कूल-प्लस टू में जरूरत के हिसाब से नहीं हुआ शिक्षकों का पदस्थापन, निदेशालय में धूल फांक रही रिपोर्ट
झारखंड के हाइस्कूल और प्लस टू विद्यालयों में शिक्षकों की कमी और असंतुलित पदस्थापन से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है. निदेशालय की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में.
सुनील कुमार झा
आपके शहर में
रांची : राज्य के हाइस्कूल और प्लस टू विद्यालयों में शिक्षकों का पदस्थापन अब तक आवश्यकता के अनुरूप नहीं हो सका है. स्कूलों में विषयवार शिक्षकों की उपलब्धता और विद्यार्थियों की संख्या के आधार पर शिक्षकों के युक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू की गयी थी. इसके लिए पिछले माह माध्यमिक शिक्षा निदेशालय ने सभी जिलों से विद्यालयवार रिपोर्ट भी मांगी गयी थी. रिपोर्ट में विषयवार शिक्षकों की संख्या के साथ-साथ कक्षावार विद्यार्थियों की संख्या की जानकारी देने को कहा गया था. हालांकि, रिपोर्ट मांगे जाने के बाद इस दिशा में आगे की कार्रवाई नहीं हुई.
इसका सीधा असर स्कूलों में विषयवार पढ़ाई की व्यवस्था पर पड़ रहा है. एक ही जिले के स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता में काफी अंतर है. कहीं विद्यार्थियों की संख्या के अनुपात में अधिक शिक्षक हैं, तो कहीं महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षक तक उपलब्ध नहीं हैं. राजधानी के मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालयों में भी ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है.
कहीं 20 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक, कहीं विषय के शिक्षक नहीं
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार राज्य में माध्यमिक स्तर पर औसतन 52 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध है. वहीं मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालयों में औसतन 25 से 30 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक हैं. रांची के कुछ विद्यालयों में यह अनुपात इससे भी बेहतर है. जिला स्कूल में करीब 20 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक, राजकीय बालिका विद्यालय बरियातू में 24, मॉडल स्कूल कांके में 21 और टीवीएस जगन्नाथपुर में करीब 20 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक कार्यरत हैं.
इसके बावजूद सभी विषयों में शिक्षकों की उपलब्धता समान नहीं है. कुछ विद्यालयों में किसी एक विषय के तीन-तीन शिक्षक पदस्थापित हैं, जबकि दूसरे विषयों में शिक्षकों की कमी बनी हुई है. हाइस्कूल के साथ प्लस टू स्तर की कक्षाओं के लिए भी शिक्षकों की व्यवस्था की गयी है. ऐसे में विषयवार जरूरत का आकलन किये बिना पदस्थापन किये जाने से शिक्षकों का संतुलित उपयोग नहीं हो पा रहा है.
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पीएम श्री आजाद विद्यालय में गणित-विज्ञान के शिक्षक नहीं
राजधानी के पीएम श्री आजाद विद्यालय में गणित और विज्ञान विषय के शिक्षक नहीं हैं. ऐसे में विद्यार्थियों को इन महत्वपूर्ण विषयों की नियमित पढ़ाई में परेशानी होती है. विशेषकर मैट्रिक और इंटरमीडिएट की परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों पर इसका अधिक असर पड़ सकता है. दूसरी ओर मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालयों में कुछ ऐसे भी स्कूल हैं, जहां सृजित पद के मुकाबले अधिक शिक्षक कार्यरत हैं. सृजित पद पर पदस्थापित शिक्षकों के अलावा अलग से शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति भी की गयी है.
इस असंतुलन से तीन स्तर पर नुकसान
1. विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित : जिस स्कूल में किसी विषय का शिक्षक नहीं है, वहां विद्यार्थियों को उस विषय की नियमित कक्षा नहीं मिल पाती. इसका असर विषय की समझ और परीक्षा परिणाम पर पड़ सकता है. 2. शिक्षकों का पूरा उपयोग नहीं : किसी स्कूल में एक ही विषय के जरूरत से अधिक शिक्षक होने पर उनकी कार्यक्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता. जबकि दूसरे स्कूलों में उसी विषय के शिक्षक की कमी बनी रहती है. 3. सरकारी संसाधनों का असमान इस्तेमाल : शिक्षकों के वेतन और अन्य संसाधनों पर सरकार खर्च करती है. इसके बावजूद यदि एक स्कूल में आवश्यकता से अधिक और दूसरे में कम शिक्षक हैं, तो उपलब्ध मानव संसाधन का बेहतर उपयोग नहीं हो पाता. शिक्षकों के युक्तिकरण से अतिरिक्त खर्च किये बिना भी जरूरत वाले स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर की जा सकती है. उत्कृष्ट विद्यालय के उद्देश्य पर भी असर
रिपोर्ट के आधार पर होना था युक्तिकरण
शिक्षा विभाग की ओर से जिलों से रिपोर्ट मांगे जाने का उद्देश्य स्कूलों में उपलब्ध शिक्षकों और विद्यार्थियों की वास्तविक स्थिति का आकलन करना था. रिपोर्ट के आधार पर जिस स्कूल में किसी विषय के शिक्षक अधिक हैं, वहां से जरूरत वाले स्कूल में शिक्षक पदस्थापित किये जाने थे. इससे शिक्षकों का युक्तिकरण होता और जिन विद्यालयों में विषयवार शिक्षकों की कमी है, वहां पढ़ाई की व्यवस्था बेहतर हो सकती थी. लेकिन रिपोर्ट मांगे जाने के बाद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने से यह कवायद फिलहाल अधूरी है.
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