7 की उम्र में खोई रोशनी, फिर भी नहीं टूटे डॉ. मोहित लाल: पढ़ें, झारखंड के दृष्टिबाधित प्रोफेसर की कहानी

Updated:
विज्ञापन

डॉ मोहित लाल की फाइल फोटो

7 साल की उम्र में आँखों की रोशनी खोने के बावजूद, डॉ. मोहित लाल ने हार नहीं मानी. उन्होंने विपरीत परिस्थितियों को हराकर रांची यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर बनकर सफलता की एक अद्भुत मिसाल पेश की है. यह कहानी आपको प्रेरित करेगी कि कैसे हौसले से हर चुनौती पार की जा सकती है.

विज्ञापन

रांची : शिक्षक दिवस के खास अवसर पर जब पूरी दुनिया गुरुजनों के योगदान को नमन कर रही है, तब हमें समाज के ऐसे शिक्षकों के संघर्ष को भी जानना चाहिए, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के आगे कभी घुटने नहीं टेके. अक्सर लोग छोटी-सी परेशानी में हिम्मत हार जाते हैं, लेकिन यह कहानी बताती है कि शिक्षक दिवस केवल आभार जताने का नहीं, बल्कि संघर्षों से सीख लेने का भी दिन है. इस कड़ी में हम आपको झारखंड के एक ऐसे ही शिक्षक की प्रेरणादायक दास्तान बता रहे हैं, जिन्होंने आंखों की रोशनी न होने के बावजूद सफलता की अद्भुत मिसाल कायम की है. यह कहानी है रांची यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. मोहित लाल की. महज 7 वर्ष की मासूम उम्र में एक गंभीर बीमारी ने उनकी आंखों का नूर हमेशा के लिए छीन लिया. अलीगढ़, दिल्ली, देहरादून और इंदौर जैसे बड़े शहरों के अस्पतालों में 5 वर्षों तक चले लंबे इलाज के बाद भी जब रोशनी वापस नहीं लौटी, तब भी उन्होंने जीवन से हार नहीं मानी. डिप्रेशन को दरकिनार कर, परिवार के अटूट सहयोग और अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने इस शारीरिक चुनौती को कभी अपनी प्रगति के रास्ते का रोड़ा नहीं बनने दिया.

आपके शहर में

विज्ञापन

'हौसले' के दम पर पाया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर का मुकाम

दृष्टिबाधित होने के बाद शिक्षा प्राप्त करने की राह बेहद कठिन और संघर्षपूर्ण थी, लेकिन डॉ. मोहित लाल ने अपना पूरा ध्यान बाधाओं के बजाय संभावनाओं (possibilities) पर केंद्रित रखा. उन्होंने ब्रेल लिपि और कठिन परिश्रम के बल पर उच्च शिक्षा हासिल की और आज रांची यूनिवर्सिटी में सैकड़ों विद्यार्थियों का भविष्य संवार रहे हैं. अपने इसी जज्बे और संघर्ष को बयां करते हुए वे कहते हैं- "वो देख हंसती है कामयाबी, कहीं ना तू हिम्मत हार जाना. सफलता चूम लेगी कदम तेरे, अगर जरा हौसला करेगा." उनका मानना है कि जब इंसान के भीतर का हौसला मजबूत होता है, तो दुनिया की कोई भी शारीरिक चुनौती उसके कदमों को रोक नहीं सकती.

ये भी पढ़ें: बिरसा इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज में शिक्षक दिवस की धूम, पौधरोपण कर दिया गया पर्यावरण संरक्षण का संदेश

वंचितों के जीवन में उजाला फैलाना ही असली शिक्षा

एक शिक्षक के रूप में अपने संघर्षपूर्ण अनुभवों को साझा करते हुए डॉ. मोहित लाल कहते हैं कि सक्षम लोग तो किसी तरह शिक्षा हासिल कर ही लेते हैं, लेकिन एक शिक्षक की असली परीक्षा और प्रतिबद्धता (commitment) समाज के अंतिम पायदान पर खड़े, गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चों को शिक्षित कर उनके चरित्र का नवनिर्माण करना है. पुराने दौर के छात्रों और आज की जनरेशन जेड (Gen Z) की तुलना करते हुए उन्होंने बताया कि पहले किताबों की कमी और पुस्तकालयों के चक्कर काटने वाले संघर्ष ने छात्रों को अधिक गहराई दी थी. वहीं, आज की डिजिटल क्रांति के दौर में सूचनाओं का अंबार तो है, लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में कई छात्र दिग्भ्रमित भी हो रहे हैं. इस अंतर को पाटना ही आज के शिक्षकों का सबसे बड़ा दायित्व है.

ये भी पढ़ें: DSPMU में गुरु-शिष्य परंपरा का संदेश, TRL विभागाध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार बोले- 'शिक्षा ही बदल सकती है समाज की दिशा'

विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola