मक्का-मड़ुआ से धान-चना तक, सात अनाजों से रांची में तैयार हो रहा करम का जावा
अनीता उरांव | Prabhat Khabar Network
रांची की युवतियां करम पर्व के लिए खास उत्साह के साथ जावा उठा रही हैं. अपनी संस्कृति और प्रकृति से जुड़े रहने का यह अनूठा तरीका हर साल निभाया जा रहा है.
रांची. करम पर्व को लेकर युवतियों में खास उत्साह है. करम पर्व के नौ दिन पहले से जावा उठाने की परंपरा निभायी जा रही है. युवतियां उपवास रखकर जावा की सेवा करती हैं और प्रतिदिन हल्दी पानी देकर उसकी देखभाल करती हैं. जावा में मक्का, मड़ुआ, गेहूं, जौ, मूंग, धान और चना समेत विभिन्न अनाजों के बीज का इस्तेमाल किया जाता है. युवतियों का कहना है कि आधुनिक जीवनशैली के बीच भी करम पर्व उन्हें अपनी संस्कृति, प्रकृति और परंपरा से जोड़े रखता है.
तीन साल से निभा रही परंपरा
सबिता कुमारी, अरगोड़ा ने बताया कि वह पिछले तीन साल से करम जावा उठा रही हैं. रांची विवि में पीजी की पढ़ाई के साथ वह अपनी परंपरा से भी जुड़ी हुई हैं. करम पर्व के नौ दिन पूर्व उपवास रखकर जावा उठाया. इसमें सात प्रकार के अनाज मक्का, मड़ुआ, गेहूं, जौ, मूंग, धान और चना के बीज को मिलाकर तीन टोकरी में जावा उठाया गया है. उन्होंने कहा कि यह परंपरा उन्हें अपनी संस्कृति से जुड़ाव महसूस कराती है.
आधुनिक युग में भी संस्कृति बचाने का संकल्प
रेशमा उरांव, पिस्का मोड़ पिछले पांच साल से जावा उठा रही हैं. उन्होंने कहा कि करम पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है. साथ ही अच्छी फसल की कामना के लिए भी यह पर्व मनाया जाता है. उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में भी पुराने समय से चली आ रही संस्कृति और परंपरा को नहीं छोड़ना चाहिए. डिजिटल युग में भी गांव की युवा पीढ़ी अपनी परंपरा को बचाकर रख रही है.
नदी नहीं मिली तो कॉलेज कैंपस से लायी बालू
अनिता उरांव, एदलहातू 12 साल से जावा उठा रही हैं. उन्होंने बताया कि नदी नहीं मिलने के कारण तीज के दूसरे दिन कॉलेज कैंपस से बालू लाकर उसमें सात या 12 प्रकार के अनाज मिलाकर जावा उठाया. वह प्रतिदिन सुबह उपवास रखकर एक बार जावा में हल्दी पानी देती रहीं. उन्होंने कहा कि करम प्रकृति से जुड़ा पर्व है. आधुनिक जीवनशैली अपनाने के बावजूद प्रकृति से जुड़ी परंपराओं को हमेशा निभाते रहना चाहिए.
नौ दिनों तक सादा भोजन
चिंतामुनी उरांव, रांची ने बताया कि वह पांच साल से जावा उठा रही हैं. जावा उठाने की परंपरा अविवाहित लड़कियां निभाती हैं. इस दौरान नौ दिनों तक सादा भोजन किया जाता है. जावा उखाड़ने के तीन दिन पहले उसमें हल्दी पानी देने की परंपरा है. उन्होंने बताया कि तीन बांस के दौरा में तीन लड़कियों ने मिलकर जावा उठाया. इसके साथ ही लोकगीत और लोकनृत्य के जरिए भी परंपरा और संस्कृति को आगे बढ़ाया जा रहा है.
पूर्वजों की सीख को आगे बढ़ा रही युवा पीढ़ी
सुषमा कुमारी, डिबडीह पिछले पांच साल से जावा उठाने की परंपरा निभा रही हैं. उन्होंने कहा कि करम पर्व अच्छी फसल की कामना और भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है. युवा पीढ़ी आधुनिक जीवनशैली की ओर बढ़ रही है, लेकिन इसके बावजूद अपनी पीढ़ियों से चली आ रही संस्कृति को नहीं छोड़ रही है. पूर्वजों से मिली सीख को आज भी युवा पीढ़ी लगातार अपना रही है और उसे आगे बढ़ा रही है.
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