झारखंड हाईकोर्ट का फैसला: 60 साल पुरानी जमाबंदी प्रशासनिक आदेश से रद्द नहीं की जा सकती

झारखंड हाईकोर्ट की फाइल फोटो.
झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग के पांडु गांव की जमीन से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. वर्षों से चली आ रही जमाबंदी को राजस्व अधिकारी अब सिर्फ प्रशासनिक आदेश के आधार पर रद्द नहीं कर सकते. अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा.
रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग जिले के केरेडारी प्रखंड स्थित पांडु गांव की जमीन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वर्षों से चली आ रही जमाबंदी को राजस्व अधिकारी केवल प्रशासनिक आदेश के आधार पर रद्द नहीं कर सकते. जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने कहा कि यदि राज्य सरकार को किसी जमाबंदी या भूमि बंदोबस्ती की वैधता पर संदेह है, तो उसे अपने अधिकार, स्वामित्व और हित के निर्धारण के लिए सक्षम सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा.
हजारीबाग उपायुक्त का आदेश रद्द
अदालत ने इस टिप्पणी के साथ हजारीबाग के तत्कालीन उपायुक्त द्वारा 23 अप्रैल 2017 को पारित जमाबंदी रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया. हालांकि हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि यदि वह संबंधित भूमि पर अपना दावा स्थापित करना चाहती है, तो विधि के अनुसार सक्षम सिविल कोर्ट में वाद दायर कर सकती है.
पुराने फैसले का दिया हवाला
जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने अपने फैसले में पहले दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय 'राज्य बनाम इजहार हुसैन' का उल्लेख किया. अदालत ने दोहराया कि लंबे समय से प्रभावी जमाबंदी को समाप्त करने का अधिकार राजस्व अधिकारियों के पास नहीं है. इस तरह के मामलों में स्वामित्व और अधिकार का अंतिम निर्णय केवल सिविल कोर्ट ही कर सकता है. अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि रजिस्टर में जमाबंदी खोलने का आदेश दर्ज नहीं है, भूमि रिटर्न उपलब्ध नहीं है या अन्य प्रशासनिक संदेह हैं, लगभग 60 वर्षों से चली आ रही जमाबंदी को रद्द नहीं किया जा सकता. ऐसे मामलों में विधिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है.
1955 से चल रही थी जमाबंदी
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिजीत कुमार सिंह और अधिवक्ता हर्ष चंद्र ने अदालत को बताया कि विवादित भूमि का बंदोबस्त तत्कालीन जमींदार द्वारा हुकुमनामा के माध्यम से किया गया था. वर्ष 1955 से संबंधित भूमि की जमाबंदी याचिकाकर्ताओं के नाम पर नियमित रूप से चल रही थी. उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता लगातार सरकारी लगान का भुगतान करते रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रशासन ने भी लंबे समय तक उनके अधिकार को स्वीकार किया था.
एनटीपीसी अधिग्रहण के समय माना गया था वैध दावेदार
सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी बताया गया कि वर्ष 2013 में एनटीपीसी द्वारा भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया के दौरान अपर समाहर्ता ने विस्तृत जांच कर याचिकाकर्ताओं को मुआवजा प्राप्त करने का वैध दावेदार माना था. जांच के बाद उन्हें भूमि का वास्तविक अधिकारधारी स्वीकार करते हुए मुआवजा देने की प्रक्रिया भी अपनाई गई थी. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब सरकारी एजेंसियां पहले उनके अधिकार को स्वीकार कर चुकी हैं, तब वर्षों बाद केवल संदेह के आधार पर जमाबंदी रद्द करना पूरी तरह अनुचित और कानून के विपरीत है.
राजस्व अधिकारियों की रिपोर्ट पर रद्द हुई थी जमाबंदी
मामले में बाद में अंचलाधिकारी ने जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की थी. रिपोर्ट में कहा गया कि रजिस्टर-दो में जमाबंदी खोलने के आदेश का उल्लेख उपलब्ध नहीं है. साथ ही भूमि रिटर्न दाखिल नहीं किए जाने तथा याचिकाकर्ताओं के मौके पर कब्जे में नहीं पाए जाने की बात कही गई. इन्हीं तथ्यों के आधार पर हजारीबाग के तत्कालीन उपायुक्त ने संबंधित जमाबंदी को संदिग्ध मानते हुए 23 अप्रैल 2017 को उसे रद्द करने का आदेश जारी कर दिया था. इसी आदेश को याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
राज्य सरकार ने जताया था संदेह
राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि कथित बंदोबस्ती संदेहास्पद है. सरकार का कहना था कि जिस समय भूमि का बंदोबस्त किया गया, उस समय याचिकाकर्ता की उम्र महज चार से पांच वर्ष थी. इसके अलावा जमाबंदी खोलने से संबंधित किसी आदेश का रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं है. इन परिस्थितियों में बंदोबस्ती की वैधता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है. हालांकि हाईकोर्ट ने माना कि केवल ऐसे संदेहों के आधार पर दशकों पुरानी जमाबंदी समाप्त नहीं की जा सकती. यदि सरकार को भूमि पर अपना अधिकार सिद्ध करना है, तो उसे सक्षम सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर करना होगा.
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याचिकाकर्ताओं को मिली राहत
उल्लेखनीय है कि इस मामले में मो. जाहिद मियां और मो. शमीम मियां ने हजारीबाग के तत्कालीन उपायुक्त द्वारा पारित जमाबंदी रद्द करने के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. सुनवाई के बाद जस्टिस आनंद सेन की अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए उपायुक्त के आदेश को निरस्त कर दिया. हाईकोर्ट का यह फैसला झारखंड में लंबे समय से चली आ रही जमाबंदियों और भूमि विवादों से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि राजस्व अधिकारी प्रशासनिक स्तर पर वर्षों पुरानी जमाबंदी समाप्त नहीं कर सकते और ऐसे विवादों का अंतिम समाधान केवल सक्षम सिविल कोर्ट के माध्यम से ही संभव है.
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By कुमार विश्वत सेन
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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