Jamshedpur News : आदिवासी बहुल गांवों में गोट बोंगा के साथ सोहराय पर्व का आगाज आज से

Updated at : 20 Oct 2025 12:52 AM (IST)
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Jamshedpur News : आदिवासी बहुल गांवों में गोट बोंगा के साथ सोहराय पर्व का आगाज आज से

Jamshedpur News : आदिवासी समाज के सबसे बड़े पर्व सोहराय का पांच दिवसीय आयोजन सोमवार से पारंपरिक गोट बोंगा पूजा से शुरू होगा.

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यह पर्व सामाजिक एकता और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति आदिवासी समाज की आस्था को दर्शाता है

Jamshedpur News :

आदिवासी समाज के सबसे बड़े पर्व सोहराय का पांच दिवसीय आयोजन सोमवार से पारंपरिक गोट बोंगा पूजा से शुरू होगा. गांव के बाहर स्थित गोट बोंगा टांडी में माझी बाबा और नायके बाबा की अगुवाई में यह पूजा अनुष्ठान संपन्न होगा. सोहराय पर्व कृषि और पशुपालन से जुड़ी समृद्ध परंपराओं का प्रतीक है, जिसका उद्देश्य गांव के लोगों और पशुधन की सुख-समृद्धि की कामना करना होता है. गोट बोंगा के दौरान नायके बाबा पारंपरिक विधि-विधान से मरांगबुरू, जाहेरआयो, लिटा मोंणे और तुरुईको देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करेंगे. पूजा के दौरान देवी-देवताओं से गांव की उन्नति, शांति और पशुधन की वृद्धि के लिए प्रार्थना की जायेगी. इस अवसर पर समुदाय के सभी लोग एकत्रित होकर सामूहिक उत्सव का हिस्सा बनेंगे, जहां गीत-संगीत और पारंपरिक नृत्य भी वातावरण को जीवंत बनायेंगे. यह पर्व सामाजिक एकता और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति आदिवासी समाज की गहरी आस्था को भी प्रकट करता है. सोहराय पर्व पांच दिनों तक पूरे क्षेत्र को उल्लास और सांस्कृतिक रंगों से भर देगा.

मवेशी को धान की बाली की माला पहनायी जायेगी

गोट पूजा के संपन्न होने के बाद गांव के सभी मवेशियों को गोट बोंगा टांडी अर्थात मैदान में एकत्रित किया जायेगा. उसके बाद पूजा के दौरान पूजा स्थल में रखे गये अंडे को फोड़ने के लिए मवेशियों को खदेड़ा जायेगा. जिनका मवेशी उस अंडे को अपने पैर से फोड़ देता है. उस मवेशी को धान की बाली से बनी माला पहनायी जायेगी.

मिट्टी की दीवारों पर सजी रंग-बिरंगी सोहराय पेंटिंग

सोहराय पर्व की तैयारी में ग्रामीण महिलाओं ने अपनी कलात्मक दक्षता का शानदार प्रदर्शन किया है. पिछले एक महीने से भी अधिक समय तक श्रम कर मिट्टी की दीवारों पर सुंदर सोहराय पेंटिंग बनायी है. प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक आकृतियों से सजी ये कलाकृतियां अब गांव की शोभा बढ़ा रही हैं. दीवारों पर बनाये गये पशु-पक्षी, फूल-पत्तियां और लोक आकृतियां इतने जीवंत प्रतीत होती हैं, मानो वे बोल पड़ेंगे. रंग-बिरंगी यह पेंटिंग आदिवासी परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रतीक है.

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