हादसे में बायां पैर गंवाया, फिर अपनी ही तकदीर से जीत गए सुशांत, कभी लोग तरस खाते थे, आज दौड़ते हैं तो तालियां बजाते हैं

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दौड़ते सुशांत (फाइल फोटो).

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जमशेदपुर के सुशांत सुना ने 2014 में एक हादसे में अपना बायां पैर खो दिया था. हिम्मत नहीं हारी और 1 जनवरी 2015 को कृत्रिम पैर के सहारे पहला कदम रखा. आज वे झारखंड के पहले 'ब्लेड रनर' हैं.

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जमशेदपुर : जिंदगी जब सबसे कठिन इम्तिहान लेती है, तब आम इंसान टूट जाता है; लेकिन कुछ विरले ऐसे भी होते हैं जो उस टूटते लम्हे को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लेते हैं। घोड़ाबांधा के 34 वर्षीय सुशांत सुना की कहानी ऐसे ही अद्भुत साहस, अटूट हौसले और जिजीविषा की मिसाल है. वर्ष 2014 के उस भयावह सड़क हादसे ने एक पल में उनसे उनका बायां पैर छीन लिया था. अस्पताल के बिस्तरों पर दर्द से छटपटाते सुशांत के सामने अंधकार था, लेकिन उन्होंने जिंदगी के आगे घुटने टेकने से इनकार कर दिया.

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1 जनवरी 2015: जब नकली पैर के साथ पड़ा पहला कदम

दर्द से भरे पलों के बाद 1 जनवरी 2015 को सुशांत ने पहली बार कृत्रिम (प्रोस्थेटिक) पैर के सहारे चलना शुरू किया. शुरुआत में कृत्रिम पैर से खाल छिलती थी, असह्य दर्द होता था और स्वजनों की आंखों में आंसू भरकर मना करने की मिन्नतें होती थीं. पर सुशांत की जिद के आगे शारीरिक पीड़ा हार गई. उन्होंने ठान लिया था कि वे किसी की सहानुभूति या तरस के मोहताज बनकर नहीं जिएंगे.

तकदीर की रुकावटों को पीछे छोड़ बने झारखंड के पहले 'ब्लेड रनर'

दर्द को दरकिनार कर जब उन्होंने दौड़ना शुरू किया, तो देखते ही देखते वे ट्रैक के बादशाह बन गए. झारखंड के पहले 'ब्लेड रनर' के रूप में राष्ट्रीय मंच पर अपनी छाप छोड़ने वाले सुशांत ने 2018 की प्रसिद्ध चेन्नई हाफ मैराथन (21 किलोमीटर) को महज 1 घंटे 45 मिनट में पूरा कर सबको स्तब्ध कर दिया. जिस राह पर चलना मुमकिन नहीं दिखता था, वहां वे अपनी दौड़ से नई तारीख लिख रहे थे.

एमबीए किया, बैंक अफसर बने और अब लक्ष्य है माउंट एवरेस्ट

सुशांत ने न केवल मैदान में लोहा मनवाया, बल्कि पढ़ाई और करियर के मोर्चे पर भी मिसाल कायम की. अपनी कड़ी मेहनत के दम पर उन्होंने एमबीए की डिग्री ली और आईबीपीएस (IBPS) की कठिन परीक्षा पास कर बैंक अधिकारी बने. रनिंग के साथ-साथ साइकलिंग और रॉक क्लाइंबिंग करने वाले सुशांत की आंखों में अब एक नया और बड़ा सपना तैर रहा है— अरुणिमा सिन्हा की तर्ज पर कृत्रिम पैर के सहारे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी 'माउंट एवरेस्ट' पर तिरंगा लहराना. सुशांत की यह कहानी सिखाती है कि शरीर का कोई अंग भले साथ छोड़ दे, लेकिन अगर दिल में हौसला और रूह में जिद्द जिंदा हो, तो इंसान हर तूफान को मोड़ सकता है.

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