तालाब का कचरा बना फैशन का खजाना, जमशेदपुर के गौरव ने जलकुंभी से तैयार की ईको-फ्रेंडली साड़ी, जानें उनकी कहानी

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गौरव आनंद.

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जमशेदपुर के गौरव आनंद ने फेंकी जाने वाली जलकुंभी को ईको-फ्रेंडली साड़ियों में बदलकर नया कीर्तिमान स्थापित किया है. उनकी इस अनोखी पहल से जहां पर्यावरण को लाभ हो रहा है, वहीं महिलाओं के लिए रोज़गार के अवसर भी पैदा हुए हैं.

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जमशेदपुर : जिस जलकुंभी को तालाब और नदी से निकालकर लोग कचरा समझकर फेंक देते हैं, वही अब साड़ी का खूबसूरत कपड़ा बन रही है. जमशेदपुर के गौरव आनंद ने जलकुंभी में छिपी इसी संभावना को पहचाना और कॉर्पोरेट की नौकरी छोड़कर इसे फाइबर में बदलने का प्रयोग शुरू किया. इस पहल ने अब कारोबार के साथ महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा किए हैं.

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जलकुंभी को तालाब से निकालते लोग.
जलकुंभी को तालाब से निकालते लोग.

जलकुंभी से निकाला कमाई का रास्ता

नदी और तालाबों में तेजी से फैलने वाली जलकुंभी लंबे समय से पर्यावरण के लिए चुनौती मानी जाती रही है. पानी की सतह पर इसकी मोटी परत जमने से जलीय पर्यावरण प्रभावित होता है. इसे हटाना अपने आप में बड़ी चुनौती है, लेकिन हटाने के बाद इससे निकलने वाले कचरे का निपटारा भी एक समस्या बन जाता है. जमशेदपुर के गौरव आनंद ने इसी समस्या को एक अलग नजरिये से देखा. उनका सवाल था—अगर जलकुंभी को सिर्फ निकालकर फेंकने के बजाय इससे कोई उपयोगी चीज बनाई जाए तो? यही सवाल आगे चलकर एक अनोखे प्रयोग की वजह बना.

कॉर्पोरेट की नौकरी छोड़ी, शुरू किया जलकुंभी पर प्रयोग

गौरव आनंद पहले टाटा ग्रुप में कॉर्पोरेट नौकरी करते थे. पर्यावरण और रोजगार से जुड़े काम को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने नौकरी छोड़कर अपने आइडिया पर काम शुरू किया. उन्होंने अपनी संस्था स्वच्छता पुकारे फाउंडेशन के माध्यम से जलकुंभी से फाइबर निकालने और उससे उपयोगी उत्पाद तैयार करने की दिशा में प्रयोग शुरू किया. लगातार प्रयास के बाद फरवरी 2022 में जलकुंभी से साड़ी तैयार करने में उन्हें सफलता मिली. इसके बाद प्रयोग यहीं नहीं रुका. जलकुंभी से तैयार फाइबर को कपास के साथ मिलाकर कपड़ा तैयार करने की प्रक्रिया पर काम आगे बढ़ाया गया. इसी कपड़े से साड़ी समेत दूसरे उत्पाद तैयार किये जाने लगे.

जसकुंभी से बनाई जा रही साड़ी.
जसकुंभी से बनाई जा रही साड़ी.

जलकुंभी से फाइबर, फाइबर से कपड़ा और फिर साड़ी

इस पूरी प्रक्रिया की कहानी भी काफी दिलचस्प है. जलकुंभी को जलस्रोतों से निकालने के बाद उससे फाइबर तैयार किया जाता है. इसके बाद फाइबर को कपास के साथ मिलाकर कपड़ा तैयार किया जाता है. यही कपड़ा आगे चलकर साड़ी और दूसरे उपयोगी उत्पादों का रूप लेता है. गौरव आनंद ने बताया - लगातार प्रयोग के बाद जलकुंभी से तैयार कपड़े को मुलायम और बेहतर गुणवत्ता वाला बनाने में सफलता मिली है. यानी तालाब से निकला एक ऐसा पौधा, जिसे आमतौर पर बेकार समझ लिया जाता है, अब फैशन उत्पाद का हिस्सा बन रहा है.

सिर्फ साड़ी नहीं, महिलाओं के लिए रोजगार की कहानी भी

इस पहल की खास बात केवल जलकुंभी से कपड़ा तैयार करना नहीं है. इसके साथ रोजगार का पहलू भी जुड़ा हुआ है. इस काम में महिलाओं को फाइबर तैयार करने, कपड़ा बनाने और उत्पाद तैयार करने जैसे अलग-अलग स्तरों पर काम के अवसर मिलने की बात कही जा रही है. इससे जलकुंभी को संसाधन में बदलने के साथ ग्रामीण और महिला रोजगार को बढ़ावा देने का प्रयास भी किया जा रहा है. यानी एक तरफ जलकुंभी से जलस्रोतों को होने वाली परेशानी कम करने की कोशिश, तो दूसरी तरफ उसी पौधे से आमदनी का रास्ता.

जलकुंभी से बनाई जा रही साड़ी.
जलकुंभी से बनाई जा रही साड़ी.

‘कचरा’ नहीं, संसाधन है - यही है इस प्रयोग का संदेश

गौरव आनंद की पहल का मूल विचार यही है कि समाज जिस चीज को बेकार समझकर फेंक देता है, उसमें भी उपयोग और आर्थिक मूल्य तलाशा जा सकता है. जलकुंभी इसका एक उदाहरण है. जिस पौधे को हटाने के लिए खर्च करना पड़ता है, उसी से अगर फाइबर, कपड़ा और फैशन उत्पाद तैयार हो सकें तो यह वेस्ट से वैल्यू बनाने की दिशा में एक अलग मॉडल हो सकता है.

अब कई राज्यों तक पहुंचाने की तैयारी

जलकुंभी से फाइबर और कपड़ा तैयार करने की इस तकनीक को देश के दूसरे हिस्सों तक ले जाने की दिशा में भी काम किये जाने की बात कही गयी है. उद्देश्य यह है कि जलकुंभी जैसी समस्या को स्थानीय स्तर पर संसाधन में बदलते हुए रोजगार के अवसर तैयार किये जा सकें. गौरव आनंद की कहानी सिर्फ एक साड़ी के तैयार होने की कहानी नहीं है. यह उस सोच की कहानी है, जिसमें कचरे में भी अवसर तलाशने की कोशिश की गयी.

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