विश्व आदिवासी दिवस पर हक नहीं तो चुप नहीं के संदेश से गूंजा जमशेदपुर

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गोपाल मैदान में पारंपरिक हथियारों संग शामिल आदिवासी समाज के लोग.

जमशेदपुर के गोपाल मैदान में विश्व आदिवासी दिवस पर एकता और अधिकारों की आवाज बुलंद हुई। हजारों की संख्या में जुटे आदिवासियों ने जल, जंगल, जमीन की रक्षा का संकल्प लिया।

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जमशेदपुर | विश्व आदिवासी दिवस पर रविवार को जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान आदिवासी एकजुटता और अधिकारों की आवाज का गवाह बना. आदिवासी छात्र एकता के तत्वावधान में आयोजित विशाल जनसभा में ‘अपनी पहचान को पहचानो’ के नारों से पूरा मैदान गूंज उठा. महाजुटान में केवल जमशेदपुर और कोल्हान ही नहीं, बल्कि झारखंड के विभिन्न जिलों के अलावा बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम से बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, शिक्षाविद, बुद्धिजीवी और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के प्रतिनिधि पहुंचे. पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों के साथ पहुंचे लोगों ने आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत और एकजुटता की झलक पेश की.

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जल-जंगल जमीन के लिए एकजुटता का संदेश

जनसभा में आदिवासी समाज ने संवैधानिक अधिकारों, सम्मान तथा जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए एकजुटता का संदेश दिया. मंच से वक्ताओं ने कहा कि आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व और पहचान को बचाने के लिए अब शिक्षा, सामाजिक चेतना और संगठन को सबसे बड़ा हथियार बनाना होगा.

अन्याय के आगे कभी नहीं झुका आदिवासी समाज : जोसाई

ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य सह आदिवासी छात्र एकता के मुख्य संरक्षक जोसाई मार्डी ने कहा - आदिवासी समाज ने कभी अन्याय के आगे घुटने नहीं टेके हैं. जब भी उनके अस्तित्व, अस्मिता और जल-जंगल-जमीन पर हमला हुआ, समाज ने संघर्ष किया है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज लंबे समय तक शांत रहता है, लेकिन जब उसके धैर्य की सीमा टूटती है तो वह अपने हक और अधिकार के लिए मजबूती से खड़ा हो जाता है. उन्होंने कहा कि आदिवासियों का इतिहास शोषण के खिलाफ संघर्ष और बलिदान का इतिहास रहा है. जोसाई मार्डी ने वर्तमान परिस्थितियों पर चिंता जताते हुए कहा कि आधुनिक दौर में भी आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं. उन्होंने कहा कि गोपाल मैदान का यह महाजुटान महज विश्व आदिवासी दिवस मनाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और पहचान की ओर लौटने तथा अधिकारों की रक्षा के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण का संदेश है.

युवाओं से अपील- शिक्षा और सामाजिक चेतना को बनाएं ताकत

जनसभा में विभिन्न राज्यों से पहुंचे प्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और छात्र नेताओं ने भी अपने विचार रखे. वक्ताओं ने कहा - आदिवासी समाज की आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए शिक्षा, एकजुटता और सामाजिक चेतना को प्राथमिकता देनी होगी. वक्ताओं ने कहा कि जल, जंगल और जमीन आदिवासी समाज के लिए केवल आजीविका का साधन नहीं हैं. ये उनकी जीवनशैली, संस्कृति और आध्यात्मिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं. इसलिए इनकी रक्षा करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है.

अहिंसक और संवैधानिक तरीके से संघर्ष जारी रखने का संकल्प

गोपाल मैदान में उमड़ी भीड़ और युवाओं की भागीदारी ने आदिवासी समाज की एकजुटता का संदेश दिया. छात्रों, युवाओं और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के प्रतिनिधियों ने अपने अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया. कार्यक्रम के अंत में लोगों ने हाथ उठाकर संकल्प लिया कि वे भाषा, संस्कृति, जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट रहेंगे और अन्याय के खिलाफ अहिंसक एवं संवैधानिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे.

जनसभा में उठे ये 8 प्रमुख मुद्दे

  1. एनईपी पर ठोस निर्णय की मांग

झारखंड में नई शिक्षा नीति (एनईपी) के अचानक लागू होने से विद्यार्थियों के सामने उत्पन्न समस्याओं का समाधान करने और उनके भविष्य को लेकर ठोस निर्णय लेने की मांग की गई।

  1. सरना धर्म कोड को संवैधानिक मान्यता

प्रकृति पूजक आदिवासियों की विशिष्ट धार्मिक पहचान को मान्यता देने के लिए सरना धर्म कोड लागू करने की मांग उठी।

  1. भूमि अधिग्रहण में ग्रामसभा की सहमति

भूमि अधिग्रहण अधिनियम-2013 का पूर्ण अनुपालन करने तथा अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण से पहले ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य करने की मांग की गई।

  1. आदिवासी बहुल क्षेत्रों को पांचवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग

देश के सभी आदिवासी बहुल क्षेत्रों को संविधान के अनुच्छेद 244(1) के तहत पांचवीं अनुसूची के दायरे में लाने की मांग की गई।

  1. अनुसूचित क्षेत्रों में नगरपालिका चुनाव पर रोक

मेसा कानून बनाए बिना अनुसूचित क्षेत्रों में नगर निगम और नगरपालिका चुनाव नहीं कराने की मांग उठाई गई।

  1. असम के आदिवासियों को एसटी सूची में शामिल करने की मांग

असम में रहने वाले संताल, हो, मुंडा और उरांव (टी-ट्राइब्स) समुदायों को संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने की मांग की गई।

  1. पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में लैंड बैंक खत्म करने की मांग

पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में लैंड बैंक को अविलंब रद्द करने की मांग जनसभा से उठाई गई।

  1. स्थानीय युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार और भाषाओं को संवैधानिक मान्यता

झारखंड राज्य के निजी क्षेत्रों में स्थानीय उम्मीदवारों के नियोजन विधेयक-2021 को जल्द लागू करने तथा हो, मुंडारी, भूमिज और कुड़ुख भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की गई।

पहचान बचाने की लड़ाई में युवा सबसे आगे

विश्व आदिवासी दिवस पर गोपाल मैदान में जुटे आदिवासी युवाओं ने साफ संदेश दिया कि पहचान, अधिकार और संस्कृति की लड़ाई केवल नारों तक सीमित नहीं रहेगी. शिक्षा के माध्यम से सशक्तिकरण, सामाजिक एकजुटता और संवैधानिक अधिकारों की समझ को आगे बढ़ाते हुए समाज को संगठित करने पर जोर दिया गया. गोपाल मैदान से उठी आवाज का मूल संदेश यही रहा—अपनी पहचान को जानो, अपनी संस्कृति को बचाओ और अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संगठित रहो.


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