Jharkhand News : गुमला की दिव्यांग कलावती कभी थी निरक्षर, मजदूरी कर पढ़ाई की, फिर 40 लोगों को बनायी साक्षर

Updated at : 07 Sep 2021 10:09 PM (IST)
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Jharkhand News : गुमला की दिव्यांग कलावती कभी थी निरक्षर, मजदूरी कर पढ़ाई की, फिर 40 लोगों को बनायी साक्षर

गुमला की दिव्यांग कलावती. कभी खुद निरक्षर थी. लेकिन, बुलंद हौसलों की बदौलत आज कलावती खुद भी साक्षर है और दूसरों को भी साक्षर करने में जुटी है. उन्होंने सबसे पहले अपने माता-पिता को साक्षर किया. फिर 40 लोगों को लिखना-पढ़ना सिखायी.

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World Literacy Day 2021, Jharkhand News (दुर्जय पासवान, गुमला) : झारखंड के गुमला जिला अंतर्गत गुमला प्रखंड के सिलाफारी ठाकुरटोली गांव की कलावती कुमारी (28 वर्ष) दोनों पैर से दिव्यांग है. वह बैशाखी के सहारे चलती है. लेकिन, कलावती के जज्बे व हौसले बुलंद है. आज से 10 साल पहले कलावती अनपढ़ थी. गरीबी के कारण मजदूरी करती थी. लेकिन, बुलंद इरादों की बूते उन्होंने मजदूरी कर पैसा कमाये और उसी पैसे से पढ़ाई की. साक्षर भारत अभियान से जुड़कर प्रेरक बनी. सबसे पहले अपने अनपढ़ माता पिता को साक्षर की. फिर गांव के 40 अनपढ़ लोगों को पढ़ना-लिखना सिखाया.

आज गांव की कई महिलाएं कलावती के कारण पढ़- लिख गयी हैं. महिला समूह से जुड़कर काम कर रही हैं. कलावती कहती है कि मैं खुद अनपढ़ थी. माता-पिता ईंट भट्ठा में काम करने सुल्तानपुर जाते थे. मैं भी अपने माता-पिता के साथ मजदूरी करने जाती थी, लेकिन दूसरे बच्चों को स्कूल जाते देख मुझे भी पढ़ने की इच्छा हुई. लेकिन, मेरी दिव्यांगता बाधा बन रही थी. फिर भी मैंने हार नहीं मानी. मैं मजदूरी के पैसे जमा कर पढ़ाई शुरू की. फिर साक्षरता अभियान से जुड़ी. पहले अपने अनपढ़ माता पिता को पढ़ाया. इसके बाद गांव के 40 लोगों को साक्षर बनाया. बहनों को भी स्कूल में दाखिला करायी. आज मुझे खुशी है. मेरे गांव में 25 परिवार रहते हैं. इस गांव के सभी महिला-पुरुष पढ़ना-लिखना जानते हैं और बच्चे स्कूल जाते हैं.

सिलाफारी गांव में हर कोई पढ़ना- लिखना जानता है

गुमला प्रखंड से 14 किमी दूर सिलाफारी लांजी पंचायत है. इस पंचायत में ठाकुरटोली बस्ती है. एक समय था. जब यहां के लोग अनपढ़ थे. बच्चों को बहुत कम स्कूल भेजते थे, लेकिन साक्षरता अभियान का असर यहां दिखा. इस गांव के 40 से अधिक लोग आज पढ़ना-लिखना सीख गये हैं. इतना ही नहीं, अब हरेक बच्चे स्कूल जाते हैं. यहां पढ़ाई को लेकर किसी प्रकार का लाज-शर्म नहीं है. कई उम्रदराज लोग भी पढ़े. हालांकि, कुछ गिने-चुने लोग यह कहकर नहीं पढ़े कि अब पढ़कर क्या करना है. लेकिन, जिनमें सिखने का जज्बा था. वे पढ़े.

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साक्षर भारत अभियान ने गांव को बनाया साक्षर : दिलीप साहू

गांव के दिलीप साहू ने कहा कि साक्षर भारत अभियान से जुड़कर इस गांव को साक्षर बनाया गया है. यह गांव कभी पिछड़ा व अशिक्षा से जूझ रहा था, लेकिन आज इस गांव में हर कोई पढ़ना-लिखना जानता है. इस गांव का शिक्षा स्तर बेहतर है. अब गांव की महिला-पुरुष भी पढ़ना-लिखना जानती है. गांव का हर बच्चा स्कूल जाता है.

पहले लगाती थी अंगूठा, अब करती हूं सिग्नेचर : शिवानी कुमारी

गांव की साक्षर महिला शिवानी कुमारी ने कहा कि मेरी उम्र 27 साल है. जब मैं शादी करके सिलाफारी ठाकुरटोली गांव आयी, तो मैं अनपढ़ थी, लेकिन मन में पढ़ाई का जज्बा था. शादी के बाद इस उम्र में कैसे पढ़े. यह बात मन में उथल-पुथल कर रहा था. अंत में हमारी गांव की कलावती जो उम्रदराज लोगों को पढ़ा रही थी. मैं भी उसके पास पढ़ने के लिए जाने लगी. जिसका नतीजा है. आज में पढ़ने के अलावा लिख भी लेती हूं. पहले अंगूठा लगाती थी. अब हस्ताक्षर करती हूं.

शुरू से अनपढ, अब दूसरों को पढ़ा रही : फुलमनी देवी

वहीं, गांव की साक्षर महिला फुलमनी देवी ने कहा कि मेरी उम्र 30 साल है. स्कूल तो देखी, लेकिन स्कूल में पढ़ाई के लिए दाखिला नहीं हुआ. मैं बचपन से अनपढ़ थी. कभी सोचा भी नहीं था कि मैं पढ़ सकूंगी. गांव की प्रेरक ने मुझे पढ़ाया. मैं अब हर काम कलम से करती हूं. खुद पढ़ने के अलावा मैं अब दूसरे लोगों को भी पढ़ा लेती हूं. गांव के कुछ लोगों को मैंने पढ़ना-लिखना सिखाया है. मन को सुकून मिलता है कि मैं पढ़-लिख गयी और अब दूसरों को पढ़ा लेती हूं. मेरा गांव साक्षर हुआ है.

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अक्षर ज्ञान की हुई जानकारी : दिलेश्वर साहू

गांव के वृद्ध दिलेश्वर साहू ने कहा कि मेरी उम्र 65 साल है. अब उम्र पूरी तरह ढल रही है. बाप-दादा ने कभी नहीं पढ़ाया था. जब बैंक में खाता खोलने व अन्य कामों के लिए हस्ताक्षर करने बोला जाता था, तो ठेपा मार देता था. लेकिन, साक्षरता अभियान से जुड़कर मैं पढ़ना-लिखना सीखा. अक्षर ज्ञान की जानकारी हो गयी है. ज्यादा पढ़ नहीं पाता, लेकिन हर काम में अब अपना हस्ताक्षर जरूर करता हूं. अपने घर के बच्चों को भी अब पढ़ने के लिए स्कूल भेजते हैं.

Posted By : Samir Ranjan.

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