300 साल से गांव में नहीं खाया मांस, न पी शराब! आज भी पूर्वजों की परंपरा निभा रहा अंबातरी
फोटो :- वैष्णवी गांव अंबातरी की तस्वीर. | Prabhat Khabar Network
चतरा जिले का अंबातरी गांव अपनी अनोखी परंपरा के लिए मशहूर है. यहाँ 300 सालों से मांस और शराब का सेवन पूरी तरह वर्जित है. जानिए इस वैष्णवी गांव की पूरी कहानी.
मयूरहंड. चतरा जिला के मयूरहंड प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत शहीद शक्ति सिंह का अंबातरी गांव अनोखा है. गांव में पूरी तरह मांस व शराब का सेवन वर्जित है. उक्त गांव के ग्रामीण शराब नहीं पीते हैं. मांस भी नहीं खातें हैं. महिला, पुरुष व बच्चे सभी मांस व शराब के सेवन से वंचित हैं. गांव वैष्णवी है. यह परंपरा लगभग 300 साल से अधिक पुरानी है. गांव के लोग इसे डिजिटल युग में भी कायम रखे हुए हैं. गांव में ठाकुरबाड़ी, शिबाला व देवी स्थान हैं. जब से गांव में ठाकुरबाड़ी मंदिर स्थापित हुई है, तब से यह परंपरा कायम है. गांव के लोग वर्षो पुरानी इस परंपरा से प्रसन्न हैं. साथ ही भविष्य में भी इसे बरकरार व कायम रखने के लिये तत्पर हैं. बुजुर्ग ग्रामीण वर्तमान युग के युवाओं को ठाकुरबाड़ी मंदिर की महत्ता की जानकारी देकर प्रेरित भी करते रहते हैं, ताकि क्षेत्र में गांव की बनी हुई पहचान बनी रहें. आस्तित्व भी नही मिटे. गांव में 65 घर है. जिसकी आबादी लगभग 400 है. गांव में राजपूत जाति के लोग ही निवास करते हैं. यहां के लोगों की मुख्य पेशा कृषि है. अधिकांश ग्रामीण खेती-गृहस्ती कर अपना जीवन-यापन करते हैं. यहां कृषि आधारित खेती होती है. अन्न का उपार्जन कर ग्रामीण किसान आर्थिक रूप से समृद्ध भी हो रहें हैं. गांव में पढ़े लिखे साक्षर लोग है. निरक्षर लोगों की संख्या कम है. एक दर्जन से अधिक लोग सरकारी नौकरी में भी अपनी सेवा दे रहें हैं. इसमें पुलिस, शिक्षक, बीसीसीएल, अधिवक्ता शामिल हैं. गांव में पशुपालक भी हैं. अधिकांश घर के सामने पशु यानी गयें बंधे नजर आतें हैं. पशुपालक गयें से दूध का उपार्जन कर आर्थिक आमदनी भी कर रहें हैं.
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गांव में पढ़ाई के लिये एक प्राथमिक विद्यालय है. उच्य शिक्षा के लिये मिडिल स्कूल, नौनिहालों के लिये आंगनबाड़ी व रोगियों के उपचार हेतु अस्पताल की सुविधा उपलब्ध नहीं है. गांव में आवागमन के लिये मुख्य सड़क पक्की यानी कालीकरण है. गांव में गलियां भी पक्की है. वहीं कई गलियां आज भी कच्ची है. अंबातरी गांव प्रखंड मुख्यालय से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. गांव के तीन दिशा उत्तर, दक्षिण व पूर्व की भूमि खेती योग्य है. वहीं पश्चिम दिशा में हरा-भरा जंगल आच्छादित है. गांव में अधिकांश यानी 80% घर पक्के है. वहीं 20 प्रतिशत पुराने घर कच्चे हैं. गांव के ग्रामीणों को सरकारी सुविधाएं जैसे आवास, पेंशन, सड़क, बिजली, पानी, सिंचाई की सुविधा मुहैया कराई जा रही है. गांव के 88 वर्षीय बुजुर्ग अमीर सिंह के अनुसार गांव में पूर्वजों की परंपरा वर्तमान समय में कायम है. पूर्वजों का मानना है कि जब से गांव में ठाकुरबाड़ी मंदिर स्थापित हुआ है, तब से मांस व शराब का सेवन बंद है. जन्म के बाद जब से मुझे होश हुआ है तब से गांव में मांस खाते व शराब पीते किन्हीं को नहीं देखा हूं. सहायक प्रधानाध्यापक विकास कुमार ने कहा कि गांव के लोग अगर जाने-अनजाने में चोरी छिपे गांव से बाहर में रहकर भी अगर मांस व शराब का सेवन कियें भी हैं, तो उनके साथ अप्रिय घटना भी घटित हुई है. गांव के बीच स्थान में स्थापित ठाकुरबाड़ी मंदिर की अपनी प्रसिद्धि व मान्यताएं है. ठाकुरबाड़ी मंदिर में प्रतिदिन सुबह-शाम चना दाल, आटा का रोटी व चावल से बना भात का भोग लगता है. मंदिर में प्रसाद के रूप में आटा, गुड़ का बना हुआ प्रसाद का चढ़ावा चढ़ाया जाता है.
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