मन्नत पूरी होने पर दहकते अंगारों पर चलते हैं भक्त, कोल्हान के इस चमत्कारी मंदिर में पूरी होती है हर मुराद...
मां भगवती मंदिर
झारखंड के 300 साल पुराने केरा मां भगवती मंदिर में दूर-दराज से श्रद्धालु मन्नत मांगने आते हैं। जानिए मंदिर की अनोखी परंपराएं और हठभक्ति के बारे में।
चक्रधरपुर: चक्रधरपुर शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर केरा गांव में स्थित मां भगवती का यह प्राचीन मंदिर कोल्हान क्षेत्र के लोगों के लिए अगाध आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है. करीब 300 वर्ष पुराने इस मंदिर की ख्याति केवल पश्चिमी सिंहभूम तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे पड़ोसी राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. धार्मिक मान्यताओं के चलते इस पवित्र मंदिर परिसर में पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है.
पेड़ों की छांव से शुरू होकर भव्य मंदिर तक का सफर

स्थानीय इतिहास और बुजुर्गों के अनुसार, लगभग तीन सौ साल पहले केरा में मां भगवती की पूजा घने जंगलों के बीच पेड़ों के नीचे की जाती थी. समय के साथ-साथ इस पावन स्थल के प्रति लोगों की आस्था और विश्वास प्रगाढ़ होता गया, जिसने धीरे-धीरे एक भव्य मंदिर का रूप ले लिया. किंवदंतियों के मुताबिक, यहां के पुरातन राजा स्वर्गीय लोकनाथ सिंहदेव के सुपुत्र स्वर्गीय लक्ष्मी नारायण सिंहदेव ने वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण कराया था.
मन्नत पूरी होने पर लौटते हैं श्रद्धालु
मां भगवती केरा के दरबार में आने वाले भक्तों का अटूट विश्वास है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु दोबारा मंदिर पहुंचकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार मां को शृंगार व आभूषण अर्पित करते हैं. इसके अलावा, यहां की पारंपरिक 'हठभक्ति' देश-दुनिया का ध्यान खींचती है. चैत्र मास के दौरान दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलना और कांटों पर लेटकर साधना करना इस मंदिर की अनूठी परंपरा है, जिसे देखने भारी भीड़ उमड़ती है.
पर्यटन के रूप में विकसित होने की आस
इस ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल को पर्यटन के मानचित्र पर विशेष पहचान दिलाने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है. केरा मेला संचालन समिति के अध्यक्ष अभिजीत भट्टाचार्य ने बताया कि मंदिर परिसर में यात्री निवास, मार्केट कॉम्प्लेक्स और केरा गांव से मंदिर मार्ग तक सोलर लाइटिंग जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास की सख्त जरूरत है. जिला प्रशासन और समिति के प्रयासों से यदि इस क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित किया जाए, तो न केवल श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को भी एक नया आयाम मिलेगा.
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