प्रह्लाद चंद्र दास की ‘दलित चेतना की कहानियां’ का लोकार्पण, बोकारो में हुआ साहित्यिक विमर्श

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कार्यक्रम में मौजूद लोग

बोकारो में प्रह्लाद चंद्र दास के कहानी-संग्रह दलित चेतना की कहानियां का लोकार्पण हुआ. आलोचकों ने इसे बदलाव की कहानियों का सशक्त दस्तावेज बताया है.

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प्रह्लाद चंद्र दास की कहानियां बदले की बजाय बदलाव की कहानियां हैं. इनकी कहानियों में दलित समाज के भीतर ब्राह्मणवाद के प्रभाव को भी रेखांकित किया गया है. यह कहना है हिंदी आलोचक प्रो डॉ कर्मानंद आर्य का. वह जलेस, बोकारो के तत्वावधान में आयोजित कथाकार व जलेस-झारखंड के अध्यक्ष प्रह्लाद चंद्र दास के कहानी-संग्रह ‘दलित चेतना की कहानियां’ के लोकार्पण सह परिचर्चा को संबोधित कर रहे थे.

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कथा चेतना में दलित विमर्श के लिए व्यापक जमीन

कार्यक्रम का आयोजन जलेस, बोकारो के तत्वावधान में आयोजित किया गया था. वरिष्ठ कवि गोपाल प्रसाद की अध्यक्षता में हुए कार्यक्रम का संचालन जलेस-झारखंड के सचिव कुमार सत्येंद्र ने किया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय से आये प्रो आर्य ने कहानी-संग्रह ‘दलित चेतना की कहानियां’ की कहानियों के आलोक में कहा कि संग्रह की कहानियां वस्तुतः दलित चेतनामूलक कहानियां हैं, जो दलित विमर्श के लिए व्यापक जमीन तैयार करती हैं.

कथ्य व कहन को लेकर अतिरिक्त सतर्कता : डॉ बलभद्र

डॉ बलभद्र ने संग्रह की कहानियों की भाषा, शिल्प और कसाव पर चर्चा करते हुए कहा कि कहानीकार कथ्य और कहन को लेकर अतिरिक्त सतर्क दिखाई देते हैं. कई जगह पूरे प्रसंग को एक पंक्ति में समेट देने की क्षमता इन कहानियों को विशिष्ट बनाती है. उन्होंने कहा कि संग्रह की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि बोकारो स्टील सिटी और धनबाद के कोयलांचल के गांवों से निर्मित होती है.

लेखक परिवर्तन के संभावित को लेकर सजग है : डॉ अच्युतानंद

डॉ अच्युतानंद मिश्र ने चेतना और विमर्श के केंद्र-पेरिफेरी संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि लेखक केवल केंद्र की अवधारणा को नकारता नहीं, बल्कि परिवर्तन के संभावित रूपों के प्रति भी सजग है. उनके अनुसार, यहां कहानीकार महज संवाद नहीं करता, बल्कि सामाजिक यथार्थ में सक्रिय भागीदारी करता है.

‘लटकी हुई शर्त’ प्रह्लाद चंद्र की यादगार कहानी : गोपाल प्रसाद

संग्रह के चयनकर्ता और भूमिका लेखक डॉ अली इमाम खां ने बताया कि शीर्षक पर लंबे विचार-विमर्श के बाद ‘दलित कहानियां’ के बजाय ‘दलित चेतना की कहानियां’ नाम तय किया गया. कथाकार कमलेश, कावेरी और डॉ सुजाता कुमारी ने भी विचार रखे. अध्यक्षीय वक्तव्य में गोपाल प्रसाद ने कहा कि संग्रह की कहानी ‘लटकी हुई शर्त’ को रेखांकित करते हुए कहा कि यह अकेली कहानी प्रह्लाद चंद्र दास को याद रखने के लिए पर्याप्त है.

इस अवसर पर ललन तिवारी, अजय यतीश, दयानंद प्रसाद बटोही, श्यामसुंदर केवट रवि, अभिषेक भारती, सुनील शरण सिन्हा समेत कई साहित्यकार व साहित्यप्रेमी उपस्थित थे. धन्यवाद ज्ञापन जलेस बोकारो के सचिव शांति भारत ने किया.

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