आज मनेगा रक्षाबंधन, पूर्णिमा में राखी बांधना शुभ, जानें सही समय और क्या है इस पर्व का धार्मिक महत्व
रक्षाबंधन
इस वर्ष 28 अगस्त को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन पूर्णिमा तिथि के शुभ संयोग के साथ आ रहा है. जानें राखी बांधने का सही मुहूर्त और इस पर्व से जुड़ी धार्मिक कथाएं.
Raksha Bandhan 2026: भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह और विश्वास का पर्व रक्षाबंधन इस वर्ष 28 अगस्त को मनाया जाएगा. इस दिन श्रावणी पूर्णिमा का भी संयोग है. धार्मिक मान्यता के अनुसार पूर्णिमा तिथि में भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधना शुभ माना जाता है. इस बार पूर्णिमा तिथि सुबह 9 बजकर 27 मिनट तक रहेगी.
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रक्षाबंधन को लेकर घरों में तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. बाजारों में रंग-बिरंगी राखियों की रौनक है, वहीं बहनें भाइयों की कलाई सजाने के लिए राखियां खरीद रही हैं. यह पर्व केवल राखी बांधने और मिठाई खिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भाई-बहन के बीच प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है.
पूर्णिमा तिथि में राखी बांधना शुभ
त्रिलोकधाम गोसपुर निवासी मैथिल पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार रक्षाबंधन के दिन पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व है. बहनों को विधिवत पूजा-अर्चना के बाद भाई की दाहिनी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधना चाहिए.
उन्होंने बताया कि भाई को पहले टीका-चंदन लगाया जाता है. इसके बाद आरती उतारकर दाहिने हाथ की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा जाता है. इस दौरान रक्षा मंत्र का उच्चारण किया जाता है.
“येन बद्धो बली राजा, दानवेंद्रो महाबलः। तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षे मा चल मा चल।”
मान्यता है कि मंत्रों से अभिमंत्रित रक्षा सूत्र केवल धागा नहीं होता, बल्कि इसमें प्रेम, श्रद्धा, मंगल और सुरक्षा की भावना जुड़ी होती है.
इस बार कई धार्मिक संयोग भी
आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि इस बार रक्षाबंधन के साथ कई धार्मिक अवसरों का भी संयोग है. श्रावणी पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार की स्मृति की जाती है. इसके साथ ही ऋषि याज्ञवल्क्य जयंती और संस्कृत दिवस का भी विशेष महत्व रहेगा.
ऐसे में इस वर्ष का रक्षाबंधन धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष माना जा रहा है.
कृष्ण और द्रौपदी की कथा से जुड़ा रक्षा का भाव
रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग भी शामिल है. मान्यता के अनुसार एक बार श्रीकृष्ण की उंगली कट गई थी. द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया.
धार्मिक परंपरा में इस घटना को भाई-बहन के निस्वार्थ प्रेम और रक्षा के भाव से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि बाद में चीरहरण के समय श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज की रक्षा की.
यह कथा बताती है कि रक्षा का रिश्ता केवल औपचारिक वचन नहीं, बल्कि जरूरत के समय एक-दूसरे के साथ खड़े रहने की भावना है.
केवल भाई की कलाई तक सीमित नहीं है रक्षा सूत्र
आचार्य मिश्र के अनुसार रक्षाबंधन की परंपरा समय के साथ बदलती रही है. धार्मिक कथाओं में रक्षा सूत्र का संबंध केवल भाई-बहन से नहीं रहा है.
देव परंपरा में इंद्राणी द्वारा अपने पति इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने का उल्लेख मिलता है. इसे पति-रक्षा सूत्र कहा जाता है. बाद में धरती पर यह परंपरा बहन द्वारा भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने के रूप में अधिक प्रचलित हुई.
इससे स्पष्ट होता है कि रक्षा सूत्र का मूल भाव किसी प्रिय व्यक्ति के मंगल, सुरक्षा और कल्याण की कामना से जुड़ा रहा है.
Raksha Bandhan 2026: बदलते समय में भी कायम है रिश्ते की मिठास
आज रक्षाबंधन का स्वरूप काफी बदल गया है. भाई-बहन कई बार अलग-अलग शहरों में रहते हैं. पढ़ाई और नौकरी के कारण परिवार दूर हो जाते हैं. इसके बावजूद राखी का त्योहार उन्हें एक-दूसरे से जोड़ने का अवसर देता है.
बहन के लिए राखी केवल भाई की कलाई पर बंधा धागा नहीं, बल्कि बचपन की यादों और रिश्ते की भावनाओं का प्रतीक होती है. वहीं भाई के लिए यह बहन के प्रति जिम्मेदारी और उसके साथ खड़े रहने का संकल्प माना जाता है.
आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने कहा कि भारतीय संस्कृति में स्त्री को सम्मान देने की परंपरा रही है और रक्षाबंधन इसी पवित्र भावना को मजबूत करता है. आज भी समाज में भाई-बहन के बीच प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे की रक्षा की भावना की उतनी ही जरूरत है.
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