नौतन में इस बार नहीं निकलेगा अखाड़े का जुलूस, मेला और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी स्थगित

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Siwan News : नौतन में वर्षों से चली आ रही अखाड़ा निकालने की परंपरा इस साल स्थगित कर दी गई है. प्रशासनिक नियमों के चलते न तो जुलूस निकलेगा और न ही मेला व सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे. स्थानीय लोगों में मायूसी छाई हुई है.

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Siwan News : नौतन में वर्षों से चली आ रही अखाड़ा निकालने की परंपरा इस वर्ष टूट गयी है. इस बार न तो अखाड़े का जुलूस निकलेगा और न ही मेला व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे. अखाड़ा संचालकों ने प्रशासनिक निर्देशों और कानूनी प्रक्रिया को देखते हुए फिलहाल आयोजन को पूजा-विधि तक सीमित रखने का निर्णय लिया है. इससे स्थानीय लोगों में मायूसी है और आयोजन को लेकर चर्चा बनी हुई है.

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दो प्रमुख अखाड़ों का होता था आयोजन

बताया जाता है कि नौतन में पूर्व से दो प्रमुख अखाड़े निकाले जाते रहे हैं. इनमें एक अखाड़ा नौतन बाजार से और दूसरा नौतन गांव से निकलता था. दोनों अखाड़े एक साथ नौतन बाजार पहुंचते थे, जहां बड़ी संख्या में लोग जुटते थे. अखाड़े में पारंपरिक खेल-कौशल के प्रदर्शन के साथ मेला और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहते थे.

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प्रशासनिक नियमों के कारण जुलूस स्थगित

इस वर्ष प्रशासनिक नियमों, कानूनी प्रक्रिया तथा डीजे और आर्केस्ट्रा पर प्रतिबंध को देखते हुए अखाड़ा संचालकों ने जुलूस निकालने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया है. नौतन बाजार के अखाड़ा संचालक व फेमस पब्लिक स्कूल के संचालक प्रसिद्ध कुमार तथा नौतन गांव के अखाड़ा संचालक नागेंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि प्रशासन की ओर से लागू नियमों और डीजे व आर्केस्ट्रा पर प्रतिबंध को देखते हुए इस बार जुलूस एवं इससे जुड़े कार्यक्रम स्थगित किये गये हैं. फिलहाल अखाड़े की पूजा-विधि ही होगी.

जुलूस नहीं निकलने से लोगों में मायूसी

स्थानीय लोगों का कहना है कि अखाड़ा और इससे जुड़े आयोजन नौतन की पुरानी सामाजिक व सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं. प्रत्येक वर्ष जुलूस देखने के लिए आसपास के गांवों से भी लोग बाजार पहुंचते थे. इस बार जुलूस और मेला नहीं होने से बाजार में पहले जैसी चहल-पहल नहीं रहेगी.

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परंपरा को व्यवस्थित तरीके से जारी रखने की मांग

लोगों का कहना है कि प्रशासनिक नियमों का पालन करते हुए पारंपरिक आयोजन को व्यवस्थित तरीके से जारी रखने की व्यवस्था होनी चाहिए. उनका कहना है कि अखाड़े से जुड़ी परंपरा को सुरक्षित रखते हुए भविष्य में नियमों के अनुरूप आयोजन की अनुमति मिलनी चाहिए.

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