सारण में ‘एक शाम शाद अजीमाबादी के नाम’ का आयोजन, साहित्यिक विरासत पर हुई चर्चा
काव्य गोष्ठी में रचना प्रस्तुत करते शायर | Prabhat Khabar Network
सारण में शायर शाद अजीमाबादी को याद किया गया. 'एक शाम शाद अजीमाबादी के नाम' कार्यक्रम में उनकी साहित्यिक योगदान, शायरी की विशेषताओं और वैचारिक विरासत पर विस्तार से चर्चा हुई. नई पीढ़ी को उनके साहित्य से जोड़ने की महत्ता पर जोर दिया गया.
Saran News : छपरा जिला उर्दू भाषा कोषांग के तत्वावधान में साहित्यिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘एक शाम शाद अजीमाबादी के नाम’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में मशहूर शायर शाद अजीमाबादी के साहित्यिक योगदान, उनकी शायरी की विशेषताओं और उनकी वैचारिक विरासत पर विस्तार से चर्चा की गयी. कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्य गोष्ठी का भी आयोजन हुआ, जिसमें उर्दू, हिंदी और भोजपुरी के शायरों ने अपना कलाम पेश किया.
नई पीढ़ी को शाद के साहित्य से परिचित कराना जरूरी
कार्यक्रम के संयोजक उप निर्वाचन पदाधिकारी सह जिला उर्दू भाषा कोषांग के प्रभारी पदाधिकारी जावेद इकबाल ने विषय प्रवेश करते हुए शाद अजीमाबादी का परिचय प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि शाद की शायरी में वैचारिक गहराई, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय भावनाओं की प्रभावी अभिव्यक्ति मिलती है. उनकी साहित्यिक सेवाएं उर्दू भाषा और साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर हैं.
उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को शाद अजीमाबादी के विचार और साहित्य से परिचित कराना सभी की जिम्मेदारी है. शाद केवल शायर नहीं थे, बल्कि उर्दू की साहित्यिक परंपरा के महत्वपूर्ण संरक्षक भी थे.
सामाजिक और मानवीय सरोकारों की झलक मिलती है
जावेद इकबाल ने कहा कि शाद अजीमाबादी की शायरी में उनके दौर की सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं की स्पष्ट झलक दिखाई देती है. उनके काव्य का अध्ययन उस समय के वैचारिक वातावरण को समझने के साथ उर्दू शायरी के विकास क्रम को जानने में भी मदद करता है.
उन्होंने शाद की साहित्यिक सेवाओं का उल्लेख करते हुए उनकी पुस्तक ‘फिक्र-ए-बलीग’ के महत्व पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि इसमें मरसिया लेखकों और उनकी साहित्यिक उपलब्धियों का उल्लेख मिलता है. शाद ने अपने समय की साहित्यिक धरोहर को सुरक्षित रखने का जो प्रयास किया, वह आज भी शोधकर्ताओं और साहित्य प्रेमियों के लिए उपयोगी है.
शाद की साहित्यिक विरासत पर शोध की जरूरत
जावेद इकबाल ने कहा कि शाद अजीमाबादी की शताब्दी की स्मृति को केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं रखना चाहिए. उनके साहित्य और वैचारिक विरासत पर गंभीर चर्चा के साथ शोध को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके योगदान से परिचित हो सकें.
‘तजकिरा-ए-बलीग’ को बताया महत्वपूर्ण कृति
राजेंद्र कॉलेज के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अलाउद्दीन खान ने कहा कि शाद अजीमाबादी की पुस्तक ‘तजकिरा-ए-बलीग’ उर्दू अदब में अहम और विशिष्ट कृति है. इसमें मरसिया निगारों के जीवन और उनकी अदबी खिदमात को जिस तरह संकलित किया गया है, वह उल्लेखनीय है. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में उपयोगी है.
नात गोई में भी शाद ने बनाई अलग पहचान
जिला स्कूल के प्राध्यापक डॉ. मोहम्मद वलीउल्लाह कादरी ने कहा कि शाद अजीमाबादी ने विशेष रूप से नात गोई में उत्कृष्ट और प्रभावशाली रचनाएं प्रस्तुत कर अपनी अलग पहचान बनायी. उन्होंने कहा कि शाद के दौर में सारण के शायर भी अपनी अदबी खिदमात से साहित्य प्रेमियों को आकर्षित कर रहे थे.
काव्य गोष्ठी में पेश किया गया कलाम
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में काव्य गोष्ठी आयोजित की गयी. इसमें शकील अनवर, जुनैद मीर, अमीन अंजुम, सुहैल हाशमी, दक्ष निरंजन शंभू, अब्दुस्समद भयंकर, बैतुल्लाह बैत, ऐनुल बरौलवी, शिशिर कुमार और सैयद अफरोज ने उर्दू, हिंदी और भोजपुरी में अपना कलाम पेश किया. उनकी प्रस्तुतियों पर श्रोताओं ने खूब सराहना की.
कार्यक्रम में मोहम्मद हारून रशीद, मो. तारिक, कमर आलम, शफारत हुसैन, बबलू भाई, वसीम अकरम राजा समेत कई साहित्य प्रेमी और गणमान्य लोग मौजूद रहे.

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