सोनपुर में श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ का शुभारंभ, श्री गजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम में प्रवचन, श्रद्धालु भक्ति रस में डूबे

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प्रवचन देते स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज की तस्वीर

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श्री गजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम में चल रहे श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञानयज्ञ के द्वितीय दिवस पर भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा प्रवाह के दौरान परम पूज्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने श्रद्धालुओं को जीवन के गूढ़ आध्यात्मिक संदेशों से अवगत कराया.

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Saran News:(अभय सिंह की रिपोर्ट) सोनपुर. श्री गजेन्द्र मोक्ष देवस्थानम में प्रवाहित हो रही श्रीमद्भागवत कथा की अमृतधारा के द्वितीय दिवस पर, परम पूज्य स्वामी लक्ष्मणाचार्य महाराज ने श्रद्धालुओं के हृदय-पटल पर भक्ति का आलोक बिखेरते हुए कहा की संसार के नियमों में परिवर्तन संभव है.शास्त्र कहते हैं कि पानी मथने से मक्खन नहीं निकलता, पर कलियुग की विचित्रता में यह भी संभव हो जाये बालू से तेल नहीं निकलता, किंतु युग-प्रभाव से वह भी हो सकता है.परन्तु एक सत्य अटल है. जीव का उद्धार, ईश्वर की अनन्य शरणागति के बिना, कदापि संभव नहीं.

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संसार के बल क्षणभंगुर, प्रभु का बल शाश्वत

संसार के बल क्षणभंगुर, प्रभु का बल शाश्वत स्वामी जी ने समझाया कि जब तक जीवात्मा मकान, दुकान, खेत-खलिहान, स्वजन-सम्बन्धी, कुटुम्ब के मिथ्या बलों पर आश्रित रहती है, वह स्वयं को बलवान समझती है.परन्तु जीवन की विपत्ति की घड़ी में ये सभी बल निष्प्राण हो जाते हैं.जो सर्वभाव से, सर्वस्व प्रभु चरणों में समर्पित कर देता है, वही प्रभु का सर्वप्रिय भक्त बनता है और उसी को मोक्ष की प्राप्ति होती है.कर्दम-देवहूति प्रसंग: दाम्पत्य का आध्यात्मिक स्वरूप इस दिव्य अवसर पर महाराज श्री ने कर्दम ऋषि एवं माता देवहूति के पावन विवाह प्रसंग का रसपान कराया.

कर्दम-देवहूति प्रसंग का हुआ वर्णन

जब तक जीव माया के आवरण में लिप्त रहता है, ठाकुर जी की कृपा से वंचित रहता है. जैसे ही वह माया का परित्याग कर देता है, परमात्मा की करुणा स्वयं बरस पड़ती है.माता देवहूति सांसारिक पति की आकांक्षा नहीं रखती थीं.उनका संकल्प था- “विवाह उसी से करूंगी जो मुझे भगवान से जोड़ दे.” कर्दम ऋषि इस दिव्य योग्यता से सम्पन्न थे, अतः भगवान के आदेश से यह मंगल परिणय संपन्न हुआ.

धर्मपत्नी का आध्यात्मिक महत्व

स्वामी ने भारतीय संस्कृति में नारी के गौरव को उद्घाटित करते हुए कहा — “हमारी संस्कृति में पत्नी को ‘धर्मपत्नी’ का गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है.संतान प्राप्ति के पश्चात वह ‘पूजनीया’ हो जाती है.पत्नी केवल भोग्या नहीं, अपितु जीव को भगवान से सम्बन्ध कराने वाली दिव्य शक्ति है.पति-पत्नी का सम्बन्ध अन्योन्याश्रय है. पत्नी के लिए एकवचन का प्रयोग शास्त्र-सम्मत नहीं.यदि पति रथ है, तो पत्नी उसकी रथी- दोनों मिलकर ही जीवन-यात्रा को धर्म-पथ पर ले जाते हैं.

भक्ति और उत्सव का वातावरण

कथा के मध्य कर्दम-देवहूति का प्रतीकात्मक जयमाल उत्सव संपन्न हुआ. मातृशक्ति ने मंगल गीतों से वातावरण को भक्तिरस से सराबोर कर दिया.देवस्थानम को पुष्प एवं दीपों से अत्यंत मनोहारी रूप में सजाया गया था.इस पावन बेला में दिलीप झा, रतन कुमार कर्ण, सियामणि कुंवर, गायत्री शुक्ला, फुल झा, नीलिमा कर्ण, सुनीता सिंह, इन्दुकुमारी, पूनम चौधरी आदि श्रद्धालुओं ने कन्यादान का सौभाग्य प्राप्त किया.दूल्हे राजा की आरती के पश्चात प्रसाद वितरण के साथ द्वितीय दिवस की कथा का भावपूर्ण विराम हुआ.भावार्थ: श्रीमद्भागवत केवल कथा नहीं, जीवन जीने की कला है.जब तक ‘मैं’ और ‘मेरा’ का बल है, तब तक बंधन है. जिस क्षण ‘सब कुछ तेरा’ का भाव जाग्रत हो जाए, उसी क्षण गजेन्द्र की भांति मोक्ष का द्वार खुल जाता है.

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