भारत छोड़ो आंदोलन के 84 साल: पटना सचिवालय पर बलिदान से जेपी के ‘आजाद दस्ते’ तक, बिहार की रही अहम भूमिका

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Quit India Movement: 84 साल पहले 1942 में जब महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल बजा, तो बिहार भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में पूरी ताकत से उतर गया. पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के लिए छात्रों का बलिदान हो या जयप्रकाश नारायण का हजारीबाग जेल से निकलकर ‘आजाद दस्ता’ बनाना, बिहार के युवाओं, किसानों और महिलाओं ने आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन की लहर नहीं थमी और जनता ने खुद इसकी कमान संभाल ली.

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Quit India Movement: 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालियर टैंक मैदान से शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन देखते ही देखते पूरे देश में जन आंदोलन बन गया. महात्मा गांधी के आह्वान पर देश के लाखों युवाओं ने आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में संभाल ली और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सड़कों पर उतर आए.

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उस दौर में बिहार भी किसी आंदोलन में पीछे नहीं रहता था. महात्मा गांधी के आह्वान पर बिहार के युवाओं ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंक दिया. जयप्रकाश नारायण सहित हजारों युवाओं ने भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. इससे अंग्रेजी हुकूमत दबाव में आ गई और उसने आंदोलन को दबाने के लिए हिंसा का सहारा लिया.

11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय पर छात्रों का बलिदान

11 अगस्त 1942 का दिन बिहार के इतिहास में काला दिन साबित हुआ. उस दिन पटना विश्वविद्यालय के छात्र अंग्रेजी सरकार के खिलाफ पटना सचिवालय पर आंदोलन कर रहे थे. छात्र अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए सचिवालय पर लहरा रहे यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़ रहे थे.

इसी दौरान अंग्रेजी सरकार के अधिकारियों ने छात्रों पर गोली चला दी. इसके बावजूद जांबाज छात्र गोलियों का सामना करते हुए सचिवालय पर तिरंगा फहराने के लिए आगे बढ़ते रहे. एक के बाद एक छात्र पुलिस की गोली का सामना करते रहे, लेकिन तिरंगे को गिरने नहीं दिया. अंततः वे सचिवालय पर तिरंगा फहराने में सफल हुए और अंग्रेजी हुकूमत को कड़ा संदेश दिया.

इस संघर्ष में पटना विश्वविद्यालय के सात छात्र शहीद हो गए. आज पटना सचिवालय के पास उन सातों शहीदों की स्मृति में स्मारक बना हुआ है.

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सात शहीदों के नाम

  • उमाकांत प्रसाद सिंह
  • रामानंद सिंह
  • सतीश प्रसाद झा
  • जगपति कुमार
  • देवीपद चौधरी
  • राजेंद्र सिंह
  • राम गोविंद सिंह

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जेपी ने हजारीबाग जेल से निकलकर संभाली आंदोलन की कमान

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण हजारीबाग सेंट्रल जेल से फरार होकर नेपाल की तराई पहुंचे. वहां उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त रूप से लड़ने के लिए 'आजाद दस्ता' का गठन किया. जेपी ने भारत छोड़ो आंदोलन को नई गति दी. इसके परिणामस्वरूप बिहार और झारखंड के इलाके में अंग्रेजी हुकूमत कमजोर पड़ने लगी.


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किसानों और महिलाओं की भी रही अहम भूमिका

भारत छोड़ो आंदोलन में किसानों और महिलाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही. किसान सभा के प्रभाव के कारण बड़ी संख्या में किसानों ने आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. महिलाओं ने भी जुलूस निकालकर और सभाओं की अध्यक्षता करके आंदोलन को मजबूती प्रदान की

बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बावजूद नहीं टूटा उत्साह

आंदोलन शुरू होते ही बिहार के कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. डॉ. राजेंद्र प्रसाद और श्रीकृष्ण सिंह जैसे नेताओं को गिरफ्तार कर बांकीपुर जेल में डाल दिया गया. इसके बावजूद जनता का उत्साह कम नहीं हुआ.

भारत छोड़ो आंदोलन ने बिहार में व्यापक जनभागीदारी का रूप ले लिया. यह आंदोलन काफी हद तक नेतृत्वविहीन होकर भी आगे बढ़ता रहा. जनता ने अपने स्तर पर आंदोलन की कमान संभाल ली और अंग्रेजी हुकूमत के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी. बिहार ने भारत छोड़ो आंदोलन में अपने संघर्ष, साहस और बलिदान के जरिए स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

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