पूर्णिया का बाड़ीहाट लक्ष्मी मंदिर: जहां महिलाएं खेलती हैं 'सिंदूर की होली', 1948 से जुड़ी है आस्था की अनूठी कहानी

Updated:
विज्ञापन

मंदिर | Prabhat Khabar Network

पूर्णिया के बाड़ीहाट में स्थित माता लक्ष्मी का मंदिर अपनी 'सिंदूर की होली' की अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है. यह 79 साल पुरानी परंपरा पति की लंबी उम्र और परिवार की सलामती की कामना के साथ मनाई जाती है. लक्ष्मी पूजा के बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर होली खेलती हैं, जो आस्था का एक अनूठा संगम है.

विज्ञापन

पूर्णिया शहर के बाड़ीहाट में स्थित धन, सुख और समृद्धि की देवी माता लक्ष्मी के मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की असीम आस्था है. इस ऐतिहासिक मंदिर को लोग न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से पूजते हैं, बल्कि इसे शहर के विकास और खुशहाली का प्रतीक भी मानते हैं. हर साल लक्ष्मी पूजा के अवसर पर यहां आस्था का बड़ा संसार सजता है. यहां की पूजा में विसर्जन से पूर्व महिलाओं द्वारा खेली जाने वाली 'सिंदूर की होली' सबसे खास और आकर्षण का केंद्र होती है, जिसे देखने के लिए श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ता है.

विसर्जन से पहले महिलाओं की खास 'सिंदूर की होली'

लक्ष्मी पूजा के संपन्न होने के बाद, माता की विदाई (विसर्जन) से ठीक पहले बाड़ीहाट मंदिर परिसर में एक अद्भुत और भावुक कर देने वाला दृश्य नजर आता है. विसर्जन से पूर्व विवाहित महिलाएं देवी मां की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं. महिलाएं सबसे पहले मां लक्ष्मी के चरणों से लेकर उनके माथे तक सिंदूर अर्पित करती हैं. इसके बाद वे एक-दूसरे के माथे और गालों पर सिंदूर लगाकर हंसी-खुशी, पारंपरिक होली की तरह 'सिंदूर की होली' खेलती हैं. इस अनूठी परंपरा के पीछे महिलाओं का मुख्य उद्देश्य अपने पति की लंबी उम्र, परिवार की सलामती और अखंड सौभाग्य की कामना करना होता है. सिंदूर की होली के बाद, सभी महिलाएं नम आंखों से माता को अगले वर्ष फिर आने का निमंत्रण देते हुए विदा करती हैं.

1948 में आजादी के ठीक बाद पड़ी थी पूजा की नींव

बाड़ीहाट में लक्ष्मी पूजा का इतिहास बेहद गौरवशाली और 79 साल पुराना है. देश को सन् 1947 में आजादी मिलने के ठीक एक साल बाद, यानी 1948 में बाड़ीहाट में इस भव्य लक्ष्मी पूजा की शुरुआत हुई थी. उस दौर में समाज के प्रबुद्ध नागरिकों, जिनमें स्व. नूनू सिंह, स्व. लक्ष्मी नारायण सिंह, शिवनाथ सिंह और रुपलाल पांडेय प्रमुख थे, ने मिलकर इस पूजा की नींव रखी थी. आज भले ही स्थापना करने वाले कई प्रबुद्ध जन हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा शुरू की गई यह पावन परंपरा आज भी उसी आस्था और भव्यता के साथ अनवरत चली आ रही है.

5 दिनों तक सजता है आस्था का संसार और भव्य मेला

पूर्णिया शहर में बाड़ीहाट का यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां हर साल देवी लक्ष्मी की पूजा इतने बड़े और व्यापक पैमाने पर आयोजित की जाती है.

  • आस्था का सैलाब: पूरे शहर और आसपास के इलाकों से लोग मां लक्ष्मी के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं. 5 दिनों तक यह मंदिर पूरे शहर के आकर्षण का मुख्य केंद्र बना रहता है.
  • भव्य मेला: पूजा के अवसर पर लगने वाला विशाल मेला लोगों को अपनी ओर खींचता है. इस मेले में ग्रामीण संस्कृति की सादगी और शहरी आधुनिकता का शानदार संगम देखने को मिलता है.
  • मीना बाजार और मनोरंजन: बच्चों के मनोरंजन के साधनों से लेकर, खिलौनों की दुकानें और 'मीना बाजार' जैसे स्टॉल मेले की रौनक बढ़ाते हैं, जहां लोग जमकर खरीदारी का आनंद लेते हैं.


विज्ञापन
अखिलेश चंद्रा

लेखक के बारे में

By अखिलेश चंद्रा

अखिलेश चंद्रा प्रिंट माध्यम में 30 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति की खबरों में रुचि रखते हैं.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन