शब्बीर कुमार आज पटना में सजाएंगे सुरों की महफिल, बोले- भोजपुरी गानों में सही धुन-बोल हों तो सीधे दिल पर असर होगा
शब्बीर कुमार की तस्वीर
प्रसिद्ध गायक शब्बीर कुमार पटना में आयोजित सुर संध्या में प्रस्तुति देने पहुंचे. उन्होंने बिहार के संगीत प्रेम, भोजपुरी संगीत के प्रति अपने लगाव और अपने करियर के यादगार पलों को साझा किया.
Shabbir Kumar Patna Event : आज शहर के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में प्रभात खबर की ओर से सुर संध्या का आयोजन किया गया है. इसमें प्रस्तुति देने के लिए शुक्रवार को मशहूर गायक शब्बीर कुमार पटना पहुंचे. उन्होंने कहा कि बिहार की जनता में सच्चे सुरों और संगीत को समझने का एक अलग ही हुनर है. यहां आकर मिलने वाली गर्मजोशी से उन्हें नई ऊर्जा मिलती है. बिहार की राजनीति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र नेताओं का खास इलाका है और राजनीति ही यहां की मुख्य पहचान है. इसके अलावा, उन्होंने बिहार के मशहूर लिट्टी-चोखे का खास स्वाद याद करते हुए कहा कि वे इसे काफी मिस करते हैं.
आपके शहर में
Q. पटना आना व ‘सुर संध्या’ को लेकर कितना एक्साइटेड हैं, क्या खास तैयारी की है?
पटना व बिहार मेरे लिए नया नहीं है. मुझे फिल्म इंडस्ट्री में बतौर प्लेबैक सिंगर 45 साल पूरे हो चुके हैं और मैं लगातार यहां आ रहा हूं. मेरा एक गाना है. जन्मों का ये नाता है.., बिहार से मेरा रिश्ता ठीक वैसा ही है. कॉन्सर्ट के लिए मेरी पूरी तैयारी है कि जो गाने लोग सुनना चाहते हैं, वही पेश करूंगा. फिर मंच पर श्रोताओं का जैसा मिजाज होगा, उस हिसाब से गानों का सिलसिला जमेगा.
Q. आपने भोजपुरी में भी काफी काम किया है, अपने अनुभवों के बारे में बताएं?
हां, मैंने भोजपुरी में करीब 60 से 70 गाने गाए हैं. मेरा गाना ‘हे डॉक्टर बाबू बताई दवाई..’ बेहद लोकप्रिय हुआ था, जिसे आज भी लोग काफी पसंद करते हैं. मैंने अलका याग्निक व कविता कृष्णमूर्ति जैसी गायिकाओं के साथ भोजपुरी गानों की रिकॉर्डिंग की है. भोजपुरी भाषा मिठास से भरी हुई है और इसके लोकसंगीत की जड़ें काफी गहरी हैं. जब सही धुन और अच्छे बोल के साथ भोजपुरी गाने बनाए जाते हैं, तो उनका जादू सीधे दिलों पर असर करता है.
Q. जो युवा मुंबई जाकर सिंगर बनने का सपना देखते हैं, उनके लिए आपकी क्या सलाह है?
आज के दौर को देखते हुए मेरी सलाह यही होगी कि युवा केवल गायकी के भरोसे मुंबई न आएं. पहले कोई ऐसा काम तलाशें जिससे स्थायी आमदनी सुनिश्चित हो सके. इसके बाद ही शौकिया या लगन के साथ संगीत में कदम बढ़ाएं. आज के दौर में केवल गायकी के दम पर करियर बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है.
Q. आज गानों में ऑटो-ट्यून के बढ़ते इस्तेमाल व नए दौर के संगीत पर आपकी क्या राय है?
हर दस साल में दौर और लोगों की पसंद बदलती है. आज का दौर कमर्शलाइज हो गया है और ऑटो-ट्यून के सहारे रास्ते चलते किसी भी व्यक्ति से गाना गवा लिया जाता है. हमारे दौर में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आरडी बर्मन जैसे महान कंपोजर और आनंद बख्शी व मजरूह सुल्तानपुरी जैसे शायर थे, जिनकी धुनों और शायरी में रूह होती थी. आज तकनीक तो बढ़ी है, लेकिन गानों में ठहराव और एहसास कम दिखता है. फिर भी, जो सच्चा संगीत है, वह हमेशा अमर रहता है.
Q. आपने करियर की शुरुआत पेंटिंग से की थी, ब्रश से माइक तक का यह सफर कैसे तय हुआ?
सच कहूं तो मुझे शुरुआत में गाने या प्लेबैक सिंगर बनने का कोई शौक या ख्वाब नहीं था. मैं तो सिर्फ पेंटिंग करता था. ड्राइंग करते-करते रेडियो पर रफी साहब के गाने सुनता था. गाने सुनते-सुनते कब संगीत से प्यार हो गया और उंगलियां चलने लगीं, पता ही नहीं चला. मैंने संगीत की कोई औपचारिक तालीम नहीं ली है. ऊपर वाले की मर्जी थी कि उन्होंने मुझे पेंटर के बजाय संगीत के रास्ते पर आगे बढ़ा दिया.
Q. रफी साहब के निधन के वक्त कब्रिस्तान का वो वाकया बहुत चर्चित है, उस समय क्या हुआ था?
1980 में जब रफी साहब का इंतकाल हुआ, तब मैं बड़ौदा में रहता था. मेरे लिए वह बेहद स्तब्ध करने वाली खबर थी. मैं दोस्तों के साथ तुरंत बाय ट्रेन मुंबई पहुंचा. बांद्रा जामा मस्जिद से पूछते-पूछते बांद्रा कब्रिस्तान तक पहुंचा. वहां भारी भीड़ थी और पुलिस का सख्त बंदोबस्त था. पुलिस की लाठियां खाकर भी मैं जनाजे तक पहुंचा. जब उनके जनाजे को उतारा जा रहा था, तब भीड़ के धक्के में मेरे हाथ की ओमेगा घड़ी खुल गई और मेरी जेब में रखी कलम उनकी कब्र में गिर गई. उस घटना ने मेरी जिंदगी को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.
Q. गायिका लता मंगेशकर जी के साथ काम करने का आपका अनुभव कैसा रहा?
लता जी के गले में साक्षात मां सरस्वती का वास था. वे सिर्फ भारत रत्न नहीं, बल्कि ब्रह्मांड रत्न हैं. उनके साथ मैंने करीब 40-50 गाने गाए हैं. पहली बार जब उनके साथ गाना गा रहा था, तो उनकी सुरीली आवाज सुनकर मैं इतना मुग्ध हो जाता था कि अपनी लाइन गाना ही भूल जाता था. लेकिन उन्होंने बेहद ममता के साथ मेरी झिझक दूर कराई. इसके अलावा मैंने आशा भोसले जी के साथ भी 100 से ज्यादा गाने गाए हैं.
Q. आपके दौर के संगीत और आज के दौर के गानों में आप क्या मुख्य अंतर देखते हैं?
हर 10 साल में पीढ़ी और लोगों की पसंद बदलती है. हमारे दौर में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आरडी बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी, नौशाद साहब जैसे महान संगीतकार और आनंद बख्शी व मजरूह सुल्तानपुरी जैसे महान शायर हुआ करते थे. उनकी धुनें और शायरी दिल को छूती थीं. आज ऑटो-ट्यून का दौर है, तकनीक से कोई भी गा लेता है. कमर्शियलाइजेशन ज्यादा हो गया है. हालांकि यह आज की पीढ़ी की पसंद है, लेकिन पुराने गानों का एहसास और बात ही कुछ अलग थी.
प्रभात खबर के मंच पर आज सुरों का जादू बिखेरेंगे शब्बीर कुमार
80-90 के दशक के सदाबहार गीतों के शौकीन पटनाइट्स के लिए प्रभात खबर की ओर से आज श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में ‘सुर संध्या’ का आयोजन किया जा रहा है. ‘एक शाम... पुरानी यादों के नाम’ थीम पर सजी यह सुरीली शाम संगीत प्रेमियों को पुरानी यादों की गलियों में ले जायेगी. शाम छह बजे से शुरू होने वाले इस कार्यक्रम में बॉलीवुड के दिग्गज गायक शब्बीर कुमार अपनी आवाज का जादू बिखेरेंगे. पटनावासियों को अपने सदाबहार गीतों पर झुमाने के लिए शब्बीर कुमार पटना पहुंच चुके हैं. 45 वर्षों के अपने संगीत सफर में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र और ऋषि कपूर जैसे दिग्गज सितारों के लिए हिट गीत गा चुके शब्बीर कुमार का पटना से पुराना रिश्ता रहा है. कार्यक्रम से पहले शुक्रवार को उन्होंने मोहम्मद रफी की यादों, लता मंगेशकर के साथ रिकॉर्डिंग के अनुभव और संगीत के बदलते दौर पर खुलकर बात की. यहां ध्यान दें - कार्यक्रम स्थल : श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल गांधी मैदान, पटना दिनांक : 22 अगस्त, 2026 (शनिवार) समय: शाम 6 बजे से है.
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