कोविड में शुरू की तैयारी, UPSC में पाई 66वीं रैंक: IAS कृतिका मिश्रा बोलीं- हिंदी साहित्य से मिली दिशा, मातृभाषा में सोचने वाले अभ्यर्थी कभी पीछे नहीं रहते..
IAS Kritika Mishra
IAS कृतिका मिश्रा ने हिंदी माध्यम से UPSC में 66वीं रैंक हासिल कर लाखों युवाओं को प्रेरित किया है. वे बताती हैं कि कैसे सीमित संसाधनों और भाषा की बाधाओं के बावजूद उन्होंने यह मुकाम हासिल किया. उनकी तैयारी के तरीके और सफलता के मंत्र जानें.
IAS Kritika Mishra Interview: यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी के दबदबे व सीमित हिंदी कंटेंट के बावजूद ऑल इंडिया 66वीं रैंक हासिल करने वाली कृतिका मिश्रा लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा हैं. कानपुर की रहने वाली व वर्तमान में (Patna Sadar SDO) पटना सदर की एसडीओ कृतिका उस साल देश भर में हिंदी माध्यम की टॉपर बनी थीं. उन्होंने अंग्रेजी अध्ययन सामग्री का हिंदी में अनुवाद कर अपनी तैयारी को धार दी थी. वे बताती हैं कि हिंदी के प्रति उनका झुकाव अपनी मां और नाना जी की वजह से है.
उनका मानना है कि वर्तमान दौर में एआइ व नए स्टडी मटीरियल से तैयारी काफी आसान हो गई है. पेश है सिविल सेवा को समाज के सशक्तिकरण का जरिया मानने वाली आईएएस कृतिका मिश्रा से हिमांशु देव की हुई बातचीत के प्रमुख अंश.
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Q. आइएएस बनने का सपना कब देखा और क्या कभी लगा था कि सफलता निश्चित है?
- कोविड के दौरान ही तैयारी शुरू कर दी थी. मैंने हिंदी साहित्य में नेट-जेआरएफ भी क्वालिफाइ किया. सच कहूं तो अंत तक यह निश्चित नहीं था कि सिलेक्शन होगा, क्योंकि यूपीएससी का पैटर्न काफी अनप्रेडिक्टेबल होता है. इसलिए मेरे पास प्लाॅन बी भी तैयार था. लेकिन सही तैयारी और निरंतर प्रयास का नतीजा रहा कि अल्टीमेटली सिलेक्शन हो गया.
Q. पटना सदर जैसे अर्बन इलाके में कानून-व्यवस्था और प्रशासन संभालना कितना चुनौतीपूर्ण है?
- इससे पहले मैंने मधेपुरा और खगड़िया के ग्रामीण इलाकों में योगदान दिया था. पटना सदर का कार्यभार संभालने के बाद मुझे अच्छा अर्बन एक्सपोजर मिला और मैं पहले से अधिक एक्टिव हुई हूं. यहां हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है. प्रशासनिक प्रोटोकॉल व नियमों का पालन करते हुए जहां भी जरूरत होती है, हम त्वरित एक्शन लेते हैं.
Q. बाहर से बिहार को देखने और यहां जमीन पर काम करने में कितना अंतर महसूस होता है?
- बाहर बैठकर लोग अक्सर सिर्फ पुरानी चुनौतियों या सोशल मीडिया की छवि को देखते हैं, लेकिन यहां जमीन पर काम करते हुए अंतर साफ दिखता है. यहां के लोगों की जरूरतें बहुत बुनियादी हैं. वे बस निष्पक्षता और सम्मान चाहते हैं. बिहार के युवाओं में पढ़ाई का अद्भुत जज्बा है और ग्रामीण महिलाएं जीविका के जरिये समाज बदल रही हैं. यहां की सकारात्मक ऊर्जा को मिट्टी से जुड़कर ही महसूस किया जा सकता है.
Q. इतनी व्यस्त प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच निजी जिंदगी व परिवार के लिए समय कैसे निकाल पाती हैं?
- जब आपको अपने पद और काम से प्यार हो जाता है, तो जिम्मेदारी बोझ नहीं लगती. जहां तक परिवार के लिए समय निकालने की बात है, तो मेरे पति अंकुर त्रिपाठी भी प्रशासनिक सेवा में हैं और फिलहाल वैशाली में असिस्टेंट कलेक्टर के पद पर कार्यरत हैं. एक ही सेवा में होने के कारण वे काम के दबाव व व्यस्तता को बखूबी समझते हैं, जिससे संतुलन बनाना आसान हो जाता है.
Q. हिंदी माध्यम के अभ्यर्थियों के लिए आज कितने अवसर हैं? उनके लिए आपकी क्या सलाह है?
- आयोग आपसे यह नहीं पूछता कि आपने विचार किस भाषा में गढ़े हैं, बल्कि यह देखता है कि आपके विश्लेषण में कितनी गहराई और प्रामाणिकता है. भाषा केवल विचारों का माध्यम है, ज्ञान की सीमा नहीं. जब आप मातृभाषा में सोचते हैं, तो आपके विचार मौलिक होते हैं, जो उत्तर लेखन व इंटरव्यू में आपकी ताकत बनते हैं. अभ्यर्थियों को संकोच त्यागकर अपनी शब्दावली को समृद्ध और प्रशासनिक स्वरूप देना चाहिए.
Q. सिविल सेवा की तैयारी कर रही छात्राओं और युवा लड़कियों को आप क्या कहना चाहेंगी?
- मैं खुद एक मध्यमवर्गीय परिवार से आती हूं और सामाजिक-मानसिक सीमाओं को समझती हूं. मेरी सलाह है कि बैकग्राउंड, भाषा या सीमित संसाधनों को अपनी कमजोरी न बनने दें. यूपीएससी की तैयारी सिर्फ नौकरी के लिए नहीं, बल्कि खुद को सशक्त बनाने की प्रक्रिया है. महिलाओं के भीतर की सहज संवेदनशीलता और धैर्य ही प्रशासनिक फैसलों में उनकी सबसे बड़ी ताकत बनती है.
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