बिहार का डुमरांव देसी गुड़ के उत्पादन में बना सिरमौर, कई राज्यों के लोग हैं मुरीद, जानिए कैसे होता है तैयार

अपनी मेहनत की बदौलत आर्थिक लाभ कमाने वाले किसानों का कहना है कि ईख की खेती के लिए सरकार की ओर से कोई बढ़ावा नहीं मिला है. सौ किलोमीटर के दायरे में एक भी चीनी मिल नहीं है, जिससे किसानों को मोटे लाभ से वंचित रहना पड़ता है
अमरनाथ केशरी, डुमरांव: आगामी 15 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जायेगा. इस पर्व में दही-चूड़ा के साथ गुड़ के मिलन से लजीज स्वाद की महत्ता बढ़ जाती है. इस पर्व को लेकर देसी गुड़ की मांग बढ़ गयी है. डुमरांव अनुमंडल के कई गांवों में बनने वाले दानेदार गुड़ के कारोबारी त्योहार को लेकर गुड़ का भंडारण करने में जुट गये हैं. मेहनतकश किसानों की आमदनी बढ़ने से उनके चेहरे पर खुशियां आ गयी हैं. इस बार यूपी की कई मंडियां भी डुमरांव इलाके के बने गुड़ की मिठास से कायल हैं. अधिक मांग होने के बाद गुड़ के कारोबार में जुटे डुमरांव के ग्रामीण इलाकों के किसानों के आंगन में गुड़ के कराह चढ़ गये हैं. गुड़ की सोंधी खुशबू से इलाका महक रहा है. इस बार यहां के दानेदार गुड़ की मिठास से उत्तरप्रदेश और झारखंड के मंडियां कायल बन गयी हैं.
गुड़ ने इलाके को दिलाई प्रसिद्धि
किसान बताते हैं कि डुमरांव के ग्रामीण इलाकों के आमसारी, अरियांव, लाखनडिहरा, नंदन, शिवपुर, चतुरशालगंज आदि इलाके के बने गुड़ ने काफी प्रसिद्धि दिलायी है. इस इलाके से किसानों के बने गुड़ यूपी के बलिया, गोरखपुर, बनारस, गाजीपुर, मुगलसराय और झारखंड के बोकारो, जमशेदपुर, रांची, चौपारण, कोडरमा के व्यापारी यहां से गुड़ की खरीदारी कर अपनी मंडियों में बेच अच्छी कमाई करते है. मकर संक्रांति पर्व को लेकर गुड़ की डिमांड बढ़ गयी है. दिन-रात किसान कड़ी मेहनत कर गुड़ बनाने में जुटे हैं.
हजारों एकड़ में होती है ईख की पैदावार
इस इलाके में हजारों एकड़ ईख की पैदावार होती है, लेकिन इलाके में चीनी मिल नहीं रहने के बावजूद किसानों की लगन और मेहनत से ईख की खेती में चमक आयी है. अपनी उपज को खपाने को लेकर किसान ने काफी मशक्कत के बाद गुड़ बनाने के काम को तवज्जो दिया है. किसान मोहन चौधरी, दिवाकर सिंह, बृजेश पासवान, अखिलेश कुमार, लालबहादुर, मार्कण्डेय प्रसाद आदि कहते हैं कि गुड़ बनाने की रुचि कई किसानों में नहीं है. अगर विशेष तौर से इसके लिए प्रशिक्षण दिया जाये, तो यह इलाका गुड़ उत्पादन में सिरमौर बन सकता है.
दस घंटे में तैयार होता है गुड़
किसान कहते हैं कि 20 किलोग्राम गुड़ बनाने में करीब 10 घंटे का समय लगता है. 80 लीटर ईख के रस को चार घंटे तक तेज़ आंच पर पकाया जाता है. जब वह मधु की तरह होता है, तो उसे दो घंटे तक ठंडी जगह पर रखने के बाद घर का पूरा परिवार दानेदार रावा को छोटे-छोटे लड्डू की तरह तैयार किया जाता है. इस काम में पूरा दिन निकल जाता है. व्यापारी इस गुड़ को 65-70 रुपये प्रति किलो के हिसाब से खरीद करते हैं और अपने मंडियों में ले जाकर 80 से 90 रुपये प्रति किलो बिक्री करते हैं. इस आमदनी से पूरे परिवार का भरण-पोषण आसानी से हो जाता है.
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मशक्कत के बाद होती है आमदनी
अपनी मेहनत की बदौलत आर्थिक लाभ कमाने वाले किसानों का कहना है कि ईख की खेती के लिए सरकार की ओर से कोई बढ़ावा नहीं मिला है. सौ किलोमीटर के दायरे में एक भी चीनी मिल नहीं है, जिससे किसानों को मोटे लाभ से वंचित रहना पड़ता है. किसान कहते हैं कि अन्य फसलों की उपज बढ़ाने के लिए सरकार नये-नये कृषि यंत्रों को मुहैया करा रही है, लेकिन ईख की खेती करनेवाले किसानों को सरकारी सहायता नहीं मिल पायी है. ईख की पैदावार के लिए आसमानी पानी पर निर्भर रहना पड़ता है.
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