नवादा: मोनिका किन्नर हत्याकांड में दो आरोपितों की अग्रिम जमानत खारिज, पोखर में मिला था पैर और बोरे में शव
व्यवहार न्यायालय नवादा का फाइल फोटो | Prabhat Khabar Network
मोनिका किन्नर हत्याकांड में मुख्य आरोपित शुभम की मां लक्ष्मी देवी व राजू की अग्रिम जमानत याचिका खारिज हुई. न्यायालय ने CDR, टावर लोकेशन और गवाहों के बयानों को आधार बनाया है. जांच आगे बढ़ रही है.
Monika Kinnar Murder Case: नवादा जिले के चर्चित मोनिका किन्नर हत्याकांड की जांच आगे बढ़ने के साथ मामले में आरोपितों पर कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है. मामले में मुख्य आरोपित शुभम कुमार की मां लक्ष्मी देवी और आरोपित राजू कुमार की ओर से दाखिल अग्रिम जमानत याचिका को अपर सत्र न्यायाधीश, व्यवहार न्यायालय-नवादा की अदालत ने 16 सितंबर 2026 को खारिज कर दिया.
लक्ष्मी देवी ने खुद को बताया था निर्दोष
लक्ष्मी देवी की ओर से दाखिल अग्रिम जमानत याचिका में उन्हें निर्दोष बताते हुए कहा गया था कि उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और उनके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. बचाव पक्ष की ओर से यह भी दलील दी गयी कि पुलिस ने एक नाबालिग के कथित स्वीकारोक्ति बयान के आधार पर उनका नाम साजिशकर्ता के रूप में लिया है.
वहीं, अभियोजन ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि अन्य आरोपितों के विरुद्ध आरोप-पत्र समर्पित हो चुका है, जबकि लक्ष्मी देवी के विरुद्ध अनुसंधान जारी है.
सीडीआर, टावर लोकेशन और गवाहों के बयान का हवाला
न्यायालय के आदेश में दर्ज अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतका मोनिका और अन्य आरोपितों के मोबाइल नंबरों का सीडीआर मंगाया गया था. आदेश में कई गवाहों के बयानों का भी उल्लेख किया गया है.
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि सह-आरोपित शुभम कुमार ने अपने कथित स्वीकारोक्ति बयान में अपनी मां लक्ष्मी देवी समेत अन्य आरोपितों के नाम लिये हैं. इसके अलावा आदेश में मृतका की मां की ओर से पटना के आलमगंज थाने में पूर्व में दर्ज करायी गयी प्राथमिकी का भी उल्लेख है.
न्यायालय ने उपलब्ध तथ्यों, सीडीआर, मोबाइल टावर लोकेशन, गवाहों के बयानों और अनुसंधान की वर्तमान स्थिति को देखते हुए लक्ष्मी देवी को अग्रिम जमानत देना उचित नहीं माना और उनकी याचिका खारिज कर दी.
राजू कुमार का प्राथमिकी में नाम नहीं, फिर भी नहीं मिली राहत
राजू कुमार की अग्रिम जमानत याचिका पर भी न्यायालय ने राहत नहीं दी. राजू की ओर से दलील दी गयी कि प्राथमिकी में उसका नाम नहीं है और उसे सह-आरोपित करण कुमार के कथित स्वीकारोक्ति बयान के आधार पर मामले में घसीटा गया है. बचाव पक्ष ने उसके खिलाफ कोई आपराधिक इतिहास नहीं होने की बात भी कही.
अभियोजन ने मोबाइल सीडीआर और टावर लोकेशन समेत अन्य साक्ष्यों का हवाला देते हुए अग्रिम जमानत का विरोध किया.
मोबाइल बातचीत और लोकेशन बनी अहम कड़ी
न्यायालय के आदेश में दर्ज तथ्यों के अनुसार, आरोपितों के मोबाइल सीडीआर में उनके बीच कई बार और काफी लंबी बातचीत का उल्लेख है. टावर लोकेशन भी घटनास्थल के आसपास का बताया गया है. स्वतंत्र गवाह के बयान में भी राजू का नाम आने का उल्लेख आदेश में किया गया है.
इसके अलावा मुख्य आरोपित शुभम कुमार द्वारा न्यायालय में आत्मसमर्पण करने और उसके कथित स्वीकारोक्ति बयान में आवेदक राजू कुमार समेत अन्य लोगों के नाम लिये जाने का भी आदेश में उल्लेख है. इन परिस्थितियों में न्यायालय ने अनुसंधान जारी रहने और उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए राजू कुमार को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया.
पोखर से मिले पैर ने खोला था हत्याकांड का रास्ता
गौरतलब है कि काशीचक के गोहिया पोखर से पहले एक मानव पैर बरामद हुआ था. इसके कुछ दिनों बाद बोरे में बंद शव मिला, जिसकी पहचान मोनिका के रूप में हुई. इसके बाद पुलिस के सामने मोनिका की पहचान, हत्या और शव के पोखर तक पहुंचने की गुत्थी सुलझाने की चुनौती थी.
करीब तीन महीने बाद मिली गुप्त सूचना के आधार पर करण की गिरफ्तारी से अनुसंधान को दिशा मिली. इसके बाद पुलिस की जांच मुख्य आरोपित शुभम तक पहुंची. शुभम ने न्यायालय में आत्मसमर्पण किया और न्यायालय के आदेश पर पुलिस को 24 घंटे का रिमांड मिला.
रिमांड के दौरान पुलिसिया पूछताछ में हत्या की कथित साजिश, मोनिका के साथ संबंध, प्रयागराज ले जाने, काशीचक लौटने के बाद हत्या, शव को बोरे में बंद कर पोखर में फेंकने तथा साक्ष्य मिटाने से जुड़े कई तथ्यों के सामने आने का पुलिस की ओर से दावा किया गया.
तकनीकी अनुसंधान से आरोपितों तक पहुंची पुलिस
जिस मामले की शुरुआत पोखर में मिले एक पैर से हुई थी, उसमें आरोपितों तक पहुंचने के लिए काशीचक पुलिस ने तकनीकी अनुसंधान, मोबाइल लोकेशन, सीडीआर, गवाहों के बयान और गुप्त सूचनाओं का सहारा लिया.
काशीचक थानाध्यक्ष गौतम कुमार के नेतृत्व में पुलिस टीम ने करण की गिरफ्तारी से लेकर मुख्य आरोपित शुभम के आत्मसमर्पण और रिमांड में पूछताछ तक मामले की कड़ियों को जोड़ने का प्रयास किया.
अब दो अग्रिम जमानत याचिकाओं के खारिज होने के बाद मामले की जांच आगे बढ़ रही है. पुलिस के सामने रिमांड में सामने आये कथित बयानों को तकनीकी, परिस्थितिजन्य और फोरेंसिक साक्ष्यों से पुष्ट करने की चुनौती है.
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