सामान्य मरीजों के साथ टीबी के मरीजों का इलाज होने से संक्रमण का बना रहता है खतरा

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 11 Dec 2019 8:42 AM

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मुंगेर : एक ओर जहां स्वास्थ्य विभाग टीबी की बीमारी के रोकथाम को लेकर लगातार नये-नये कार्यक्रम चला रही है. वहीं दूसरी ओर सदर अस्पताल में टीबी की बीमारी को संक्रामक बनाने का पूरा इंतजाम कर दिया गया है. टीबी के मरीजों को भर्ती कर उसका इलाज किये जाने के लिए सदर अस्पताल में जिला […]

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मुंगेर : एक ओर जहां स्वास्थ्य विभाग टीबी की बीमारी के रोकथाम को लेकर लगातार नये-नये कार्यक्रम चला रही है. वहीं दूसरी ओर सदर अस्पताल में टीबी की बीमारी को संक्रामक बनाने का पूरा इंतजाम कर दिया गया है. टीबी के मरीजों को भर्ती कर उसका इलाज किये जाने के लिए सदर अस्पताल में जिला ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी सेंटर बनाया तो गया है, किंतु वह महज हाथी का दांत साबित हो रहा है.

हाल यह है कि जिस टीबी के मरीज को टीबी सेंटर में भर्ती किया जाना चाहिए, उसे पुरुष मेडिकल वार्ड में भर्ती कर दिया गया है. जिसके कारण यहां पर भर्ती सामान्य मरीजों में भी टीबी का संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ गयी है. बावजूद उस पर यहां के अधिकारी संज्ञान नहीं ले रहे.
6 दिनों से मेडिकल वार्ड में भर्ती है टीबी का मरीज : सदर अस्पताल के पुरुष मेडिकल वार्ड में पिछले छह दिनों से टीबी का मरीज भर्ती है. पटना सिटी के मारूफगंज निवासी जोधी महतो के पुत्र मुनी लाल महतो को उसके परिजनों ने इलाज के लिए पिछले 5 दिसंबर को सदर अस्पताल लाया.
जहां इमरजेंसी वार्ड में मौजूद चिकित्सक ने उसका प्राथमिक उपचार कर उसे कुछ जांच कराने को कहा तथा तत्काल उसे पुरुष मेडिकल वार्ड में भर्ती कर दिया गया. जांच कराने पर उसका टीबी रिपोर्ट पॉजटिव पाया गया. वह न तो कोई दवा खा रहा है और न ही इंजेक्शन ही ले रहा है.
बावजूद प्रतिदिन चिकित्सक राउंड पर आते हैं तथा उसका जांच कर चले जाते हैं. जबकि उस वार्ड में सामान्य बीमारियों वाले मरीजों का भी इलाज है. मालूम हो कि बीमार लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है. ऐसे में जब टीबी जैसे संक्रामक मरीज को मेडिकल वार्ड में भर्ती कर दिया गया है, तो उससे अन्य मरीजों में भी इसका संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ गयी है.
कहते हैं सिविल सर्जन
सिविल सर्जन डॉ पुरुषोत्तम कुमार ने बताया कि टीबी के मरीज को दवा खिला देने के बाद उससे दूसरे व्यक्ति में संक्रमण नहीं होता है. यदि उसने दवा नहीं खायी है तो उसे दूसरे वार्ड में तत्काल शिफ्ट करवा दिया जायेगा.
मरीजों को नहीं मिल रहा टीबी सेंटर का लाभ
इसी साल 19 जुलाई को सदर अस्पताल में दो बेड वाले जिला ड्रग-रेसिस्टेंट टीबी सेंटर का उदघाटन सिविल सर्जन डॉ पुरुषोत्तम कुमार ने किया था. इस सेंटर को स्थापित किये जाने का मुख्य उद्देश्य यह था कि एमडीआर टीबी के मरीजों को यहां एक सप्ताह तक भर्ती रख कर उसका इलाज किया जाये. किंतु सेंटर के उद्घाटन के पांच माह बीत जाने के बावजूद स्वास्थ्य विभाग के उद्देश्य यहां पूरे नहीं हो पा रहे हैं.
कागजी तौर पर भले ही यहां इंचार्ज व नर्स का रोस्टर तैयार कर दिया गया हो, किंतु वास्तव में यहां एमडीआर मरीजों को भर्ती किया ही नहीं जाता है. मालूम हो कि इस साल खोजे गये 1643 टीबी के मरीजों में से अक्टूबर माह तक 52 एमडीआर टीबी के मरीज पाये गये हैं.
मंगलवार को जब प्रभात खबर की टीम यहां पड़ताल के लिये यहां पहुंची तो यहां एक स्टाफ भी मौजूद नहीं था. सूत्रों की मानें तो यहां पांच महीने में पांच मरीज भी भर्ती नहीं हुए हैं. पिछले रविवार को ही यहां 20 दिनों से भर्ती नौवागढ़ी निवासी टीबी का मरीज राजाराम मंडल की मौत भी हो चुकी है. बावजूद इस सेंटर में टीबी के मरीजों को भर्ती नहीं किया जाना काफी दुर्भाग्यपूर्ण है.
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