चंपारण की धरती पर मखाना की खेती ने पकड़ी रफ्तार, खेत से बाजार तक बढ़ रहा रोजगार
जायजा लेते बिहार मछुआरा आयोग अध्यक्ष ललन कुमार सहनी उपस्थित अन्य
चंपारण में मखाना की खेती किसानों के लिए आय और रोजगार का नया जरिया बन रही है. इस पारंपरिक खेती को ललन कुमार सहनी जैसे किसान आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है.
Motihari News: बंजरिया. चंपारण की उपजाऊ धरती पर मखाना की खेती किसानों के लिए आय और रोजगार का नया जरिया बन रही है. बिहार मछुआरा आयोग के अध्यक्ष ललन कुमार सहनी ने हाल ही में बंजरिया प्रखंड के चैलाहां, तरकुलवा और धनौती स्थित अपने खेतों का दौरा किया. इस दौरान उन्होंने खेत से निकाले गये मखाने की गुड़िया यानी बीज की चुनाई, सफाई और प्रसंस्करण की तैयारी का जायजा लिया.
मखाना की खेती में फसल निकालने के बाद उसकी सही तरीके से चुनाई और सफाई महत्वपूर्ण मानी जाती है. खेत से निकलने के बाद बीज को प्रसंस्करण के लिए तैयार करने में स्थानीय मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है.
मखाना की चुनाई और सफाई में मजदूरों की अहम भूमिका
खेत से मखाना निकालने के बाद उसकी चुनाई, सफाई और प्रसंस्करण के लिए तैयार करने का काम मेहनत वाला होता है. ललन कुमार सहनी ने इस काम में लगे मजदूरों के प्रयास और अनुभव की सराहना की.
उन्होंने कहा कि मजदूरों की मेहनत और अनुभव से ही बेहतर गुणवत्ता वाला मखाना तैयार करने में मदद मिलती है. खेती से लेकर प्रसंस्करण तक स्थानीय श्रमिक इस पूरी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.
दस वर्षों से कर रहे हैं मखाना की खेती
ललन कुमार सहनी पिछले करीब दस वर्षों से धनौती नदी क्षेत्र में कई एकड़ में मखाना की खेती कर रहे हैं. उनके पिता दारोगा चौधरी भी इसी क्षेत्र में मखाना की खेती करते थे.
इस तरह मखाना की खेती उनके परिवार की पुश्तैनी और पारंपरिक गतिविधियों से जुड़ी हुई है. वर्षों से चली आ रही इस खेती को आगे बढ़ाते हुए ललन कुमार सहनी लगातार मखाना उत्पादन कर रहे हैं.
सिंचाई के पानी की समस्या के बीच तैयार होती है फसल
मखाना की खेती के सामने सिंचाई की समस्या भी एक बड़ी चुनौती है. पिछले कई वर्षों से धनौती नदी क्षेत्र में खेती के लिए पानी की परेशानी सामने आती रही है.
फसल को बचाने के लिए पंपसेट के माध्यम से खेतों में पानी पहुंचाया जाता है. पानी की समस्या के बावजूद मखाना की खेती जारी रखना किसानों के लिए अतिरिक्त मेहनत वाला काम है. इसके बावजूद क्षेत्र में मखाना उत्पादन का काम जारी है.
खेती से स्थानीय स्तर पर बढ़ रहा रोजगार
मखाना की खेती का फायदा सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं है. खेत से फसल निकालने, उसकी चुनाई, सफाई और प्रसंस्करण तक की प्रक्रिया में स्थानीय मजदूरों को रोजगार मिलता है.
मखाना की खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों के विस्तार से ग्रामीण स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं. इससे खेती से जुड़े श्रमिकों को स्थानीय स्तर पर काम मिलने में मदद मिलती है.
चंपारण में मखाना खेती से बढ़ रही उम्मीद
चैलाहां, तरकुलवा और धनौती में मखाना की खेती के साथ किसानों की मेहनत और पारंपरिक अनुभव भी जुड़ा हुआ है. जल संकट जैसी चुनौतियों के बावजूद किसान फसल तैयार करने में जुटे हैं.
मखाना की खेती, प्रसंस्करण और इससे जुड़े रोजगार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अपनी जगह बनायी है. ऐसे में चंपारण के किसानों के लिए मखाना खेती आय और रोजगार की संभावनाओं से जुड़ा क्षेत्र बन रही है.
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