दुल्लीपट्टी के 23 वर्षीय नथुनी साह ने आजादी के लिए दी जान, जानिए शहीद चौक की कहानी
अमर शहीद नथुनी साह के मूर्ति पर माल्यार्पण करते लोग
जयनगर का शहीद चौक आज अनुमंडल की पहचान है, लेकिन इसके नाम के पीछे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की एक वीरगाथा छिपी है. 23 वर्षीय नथुनी साह ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान न्योछावर कर दी. उनकी शहादत की स्मृति में बने शहीद चौक की कहानी को जानें.
Shaheed Nathuni Sah: जयनगर का शहीद चौक आज अनुमंडल मुख्यालय की पहचान का प्रमुख केंद्र है, लेकिन इस नाम के पीछे आजादी के आंदोलन की एक ऐसी कहानी है, जिसे 13 अगस्त आते ही स्थानीय लोग याद करते हैं. वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दुल्लीपट्टी गांव के 23 वर्षीय नथुनी साह अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जयनगर थाना के घेराव में शामिल हुए थे. इसी दौरान ब्रिटिश पुलिस की फायरिंग में वे शहीद हो गये. उनकी शहादत की स्मृति में बाद में इस स्थल को शहीद चौक के नाम से जाना जाने लगा.
13 अगस्त 1942 को जयनगर थाना का हुआ था घेराव
स्थानीय उपलब्ध विवरण के अनुसार भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान दुल्लीपट्टी गांव के युवाओं ने भी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी थी. नथुनी साह के साथ गुलाब झा, अनिरुद्ध पंडित और बिरजू साह समेत अन्य युवक आंदोलन में शामिल थे. 13 अगस्त 1942 को आंदोलनकारियों ने जयनगर थाना का घेराव किया. इस दौरान अंग्रेज पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच संघर्ष हुआ और पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी. गोली लगने से नथुनी साह शहीद हो गये.
23 साल की उम्र में दी शहादत
स्थानीय समाचार रिपोर्टों में नथुनी साह की उम्र शहादत के समय 23 वर्ष बतायी गयी है. उपलब्ध ऐतिहासिक संकलन में उन्हें दुल्लीपट्टी, जयनगर के निवासी और रबी साह का पुत्र बताया गया है. इस स्रोत में उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय छात्र बताते हुए 13 अगस्त 1942 को पुलिस की गोली से मारे जाने का उल्लेख है.
दुल्लीपट्टी के युवाओं ने गांव में बनाई थी आंदोलन की रणनीति
नथुनी साह दुल्लीपट्टी के युवाओं के साथ गांव के दुर्गा मंदिर परिसर में आजादी के आंदोलन को लेकर रणनीति बनाते थे. गुलाब झा, अनिरुद्ध पंडित और बिरजू साह भी उनके साथ आंदोलन में सक्रिय थे. इसके बाद जयनगर क्षेत्र में भारत छोड़ो आंदोलन की गतिविधियों में इन युवाओं की भागीदारी बढ़ी.
शहादत स्थल बना शहीद चौक
नथुनी साह की शहादत के बाद जयनगर थाना के पास स्थित इस स्थान को स्थानीय लोगों ने शहीद चौक कहना शुरू कर दिया. बाद में यहां शहीद स्मारक बनाया गया. आज यही स्थल जयनगर अनुमंडल मुख्यालय के प्रमुख स्थानों में शामिल है. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर यहां राष्ट्रध्वज फहराने और शहीद को श्रद्धांजलि देने की परंपरा रही है.
82 साल तक स्मारक पर नहीं थी नथुनी साह की प्रतिमा
इस कहानी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिस शहादत की वजह से जगह का नाम शहीद चौक पड़ा, वहां लंबे समय तक नथुनी साह की प्रतिमा नहीं थी. वर्ष 2024 में उनके शहादत दिवस के अवसर पर शहादत स्थल के विकास के बाद उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया. प्रतिमा स्थापित होने से पहले स्मारक के जीर्णोद्धार और विकास की मांग भी उठती रही थी.
2024 में मिली शहीद की प्रतिमा, 2025 में भी हुआ कार्यक्रम
वर्ष 2024 में शहादत दिवस पर नथुनी साह की प्रतिमा का अनावरण किया गया. कार्यक्रम में प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया. इसके बाद वर्ष 2025 में भी 13 अगस्त को शहीद चौक पर शहादत दिवस मनाया गया और प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी. कार्यक्रम में बच्चों के लिए निबंध प्रतियोगिता भी आयोजित की गयी, जिससे नयी पीढ़ी को स्थानीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने की कोशिश दिखी.
आज भी नाम में जिंदा है 1942 की कहानी
जयनगर आने-जाने वाले लोगों के लिए शहीद चौक आज एक सामान्य सार्वजनिक स्थल हो सकता है, लेकिन इसके नाम के पीछे 1942 के उस आंदोलन की स्मृति है, जिसमें दुल्लीपट्टी का एक 23 वर्षीय युवक अंग्रेजी शासन के खिलाफ खड़ा हुआ और गोली लगने से शहीद हो गया. नथुनी साह की प्रतिमा लगने के बाद अब उस शहादत को एक चेहरा भी मिल गया है. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब देशभर में आजादी का उत्सव मनाया जाता है, तब जयनगर का यह चौक स्थानीय इतिहास की उस कड़ी की याद दिलाता है, जिसमें आजादी की लड़ाई गांव और कस्बों की सड़कों तक पहुंची थी.
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लेखक के बारे में
By सरफराज अहमद
सरफराज अहमद IIMC से प्रशिक्षित पत्रकार हैं. राजनीति, समाज और हाइपरलोकल मुद्दों पर लिखते हैं. क्रिकेट और सिनेमा में गहरी रुचि रखते हैं. बीते तीन वर्षों से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर की डिजिटल टीम के साथ कार्यरत हैं।
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