देसी फ्रीज (मटका) के कद्रदान हुए रेफ्रिजेटर के मुरीद

Updated at : 27 Apr 2018 6:21 AM (IST)
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देसी फ्रीज (मटका) के कद्रदान हुए रेफ्रिजेटर के मुरीद

गर्मी में मटका का पानी पहुंचाती है ठंडक मधेपुरा : एक वक्त था जब मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाया जाता था और मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू खाने के जायके को बढ़ा देती थी, लेकिन धीरे-धीरे मिट्टी के बने बर्तन पारंपरिक आयोजन के प्रतीक बन कर रह गये. बर्तन की बात कौन करे अब […]

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गर्मी में मटका का पानी पहुंचाती है ठंडक

मधेपुरा : एक वक्त था जब मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाया जाता था और मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू खाने के जायके को बढ़ा देती थी, लेकिन धीरे-धीरे मिट्टी के बने बर्तन पारंपरिक आयोजन के प्रतीक बन कर रह गये. बर्तन की बात कौन करे अब तो देवी देवताओं की मूर्तियां भी प्लास्टर ऑफ पेरिस की भेंट चढ़ रही हैं. नतीजतन मिट्टी का घड़ा, दीये और मूर्तियां बनाने वाले कुम्हार कठिन हालातों से जूझ रहे हैं. एक समय था, जब लोग कुम्हार के हाथों से बने दीयों को भगवान के सामने जलाकर घरों को रोशन करते थे.
गर्मी के दिनों में मिट्टी के घड़े में रखे गये पेयजल गले को ठंडक पहुंचाते थे. लेकिन, अब आधुनिक सुविधाओं की वजह से लोग परंपराओं को भी भूल चुके हैं. मिट्टी के मटके की जगह रेफ्रिजेटर ने घरों में जगह बना ली है. इसका सबसे ज्यादा असर उनकी जिंदगी पर पड़ा, जो इसी के जरिये रोजी-रोटी कमा रहे थे.
गुमनाम हो रहे गांव के कुम्हार. हालत यह है कि आज कुम्हार गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर है. पहले प्लास्टिक और स्टील के बर्तनों ने कुम्हारों के पेट पर लात मार दिया इसके बाद रही सही कसर पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) ने पूरी कर दी लिहाजा कुम्हार सड़क पर आ गये हैं. चीन से आ रहे दीपक-मूर्तियों ने उन्हें दूसरा काम करने पर मजबूर कर दिया है. मिठाई गांव के कुम्हारों ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि बीते दस सालों में प्लास्टिक, पीओपी और चाइना के सामान ने उनके उनका रोजगार छीन लिया है. वहीं, मिट्टी की बढ़ती कीमतों ने आग में घी डालने का काम किया. सरकार मिट्टी काटने पर भी प्रतिबंध लगा चुकी है. इस वजह से करीब सत्तर फीसदी कुम्हार पैतृक व्यवसाय छोड़ कर दूसरा काम करने के लिए मजबूर हो गये हैं.
लोगों को चमकदार चीजें करती है आकर्षित. कुम्हार अजय पंडित ने बताया कि पिछले साल कुछ लोगों ने चायनीज सामान के खिलाफ अभियान चलाया था. इसके बावजूद मार्केट में अभी भी चाइनीज माल धड़ल्ले से बिक रहा है. ऐसे में मिट्टी खरीद कर बरतन बनाने वाला कुम्हार जब बाजार में सामान लेकर खड़ा होता है तो कोई उसे पूछता भी नहीं है. हाथ के बनाये सामान में उतनी फिनिशिंग नहीं आ पाती है, जितनी मशीन से बनी चीजों में होती है. आजकल ग्राहकों को सिर्फ चमकदार सामान ही पसंद आता है. उन्होंने बताया कि अगर ऐसे ही हालात रहे तो वह वक्त ज्यादा दूर नहीं है, जब कुम्हार विलुप्त हो जायेंगे. उनके बच्चों ने भी पुश्तैनी काम छोड़कर दूसरा धंधा करना शुरू कर दिया है. पूरी बस्ती में कुछ ही गिने-चुने कुम्हार हैं. वहीं, इनमें से सिर्फ तीन-चार ही हाथ से चलने वाले चाक बचे हैं.
मिट्टी के सुराही बनाने वाले अतुल पंडित कहते हैं कि पिछले साल गर्मी शुरू होते ही चार दर्जन से अधिक मिट्टी का घड़ा बेच चुके थे. उनकी जितनी लागत व मेहनत लगती है, उस हिसाब से सामान का दाम नहीं मिलता है. ऐसे में मुनाफा न मिलने के कारण भी लोगों ने ये काम बंद कर दिया है.
लालू ने सोचा था, किसी को फिक्र नहीं. 80 वर्षीय कुम्हार राम पंडित मिट्टी का बर्तन बना कर फुटपाथ पर बेचते हैं, लेकिन इससे उतना नहीं कमा पाते जिससे अपनी परिवार चला सकें. उनकी आवाज में एक दर्द है तो सरकार के प्रति गुस्सा भी. करीब 30 सालों से इस व्यवसाय में लगे राम का कहना है कि आज मिट्टी के बने बर्तनों की मांग इस कदर कम हो गयी है कि कभी-कभी दिन में 100 रुपये तक की बिक्री भी नहीं हो पाती है. लालू प्रसाद के रेलमंत्री बनने पर मिट्टी के कुल्हर की बिक्री हुई थी, लेकिन बाद की सरकार ने ध्यान नहीं दिया.
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