जैन धर्म सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, श्रेष्ठ जीवन जीने की अनूठी कला, ठाकुरगंज में बोलीं विशुद्ध मति माता जी

Published by : Divyanshu Prashant Updated At : 24 May 2026 9:15 AM

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धर्मसभा

Thakurganj Jain Dharm Sabha: भौतिकता की अंधी दौड़ में क्या हम अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं. किशनगंज के ठाकुरगंज से आई यह आध्यात्मिक रिपोर्ट आत्मा को झकझोरने वाली है, जहां माता जी ने जीवन को सही दिशा में जीने का सच्चा मार्ग दिखाया है.

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Thakurganj Jain Dharm Sabha: ठाकुरगंज से बच्छराज नखत की रिपोर्ट: स्थानीय जैन मंदिर परिसर में आयोजित भव्य धर्मसभा में गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री विशुद्ध मति माता जी ने श्रद्धालुओं को विशेष संदेश दिया. उन्होंने कहा कि जैन धर्म के नियमों और श्रेष्ठ आचरण को अपने व्यावहारिक जीवन में उतारने के बाद ही हम सच्चे जैनी कहलाने के अधिकारी बनते हैं.

आचरण, वाणी और व्यवहार में दिखना चाहिए धर्म का वास्तविक स्वरूप

धर्मसभा को संबोधित करते हुए माता जी ने कहा कि जैन धर्म केवल पूजा-पाठ या क्रियाकांडों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को संयम, सदाचार और आत्म-अनुशासन के साथ जीवन जीने की कला सिखाता है. उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल मंदिर जाने या बड़े धार्मिक आयोजनों में शामिल होने से नहीं, बल्कि व्यक्ति के दैनिक व्यवहार, मधुर वाणी और पवित्र कर्मों में दिखाई देना चाहिए. जीवन में अहिंसा, सत्य, करुणा और संयम को पूरी निष्ठा से अपनाना ही वास्तविक धार्मिकता है.

छह द्रव्यों के महत्व को समझकर ही होगा आत्मकल्याण

अपने प्रवचन के दौरान माता जी ने जैन दर्शन के छह मूल द्रव्यों — जीव, अजीव, धर्म, अधर्म, आकाश और काल — के गूढ़ रहस्य और महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने श्रद्धालुओं को समझाया कि इन दार्शनिक सिद्धांतों को गहराई से समझकर जीवन में अपनाने से ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है. यदि मनुष्य अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे धार्मिक नियमों और मर्यादाओं का ईमानदारी से पालन करे, तो परिवार के साथ-साथ पूरे समाज में सकारात्मक और कल्याणकारी परिवर्तन लाया जा सकता है.

युवाओं और बच्चों को नैतिक मूल्यों से जोड़ना आज की बड़ी जरूरत

वर्तमान समय की विसंगतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए माता जी ने कहा कि आज लोग भौतिक सुख-सुविधाओं और बाहरी दिखावे की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं, जिसके कारण हमारी नई पीढ़ी धर्म और मूल संस्कारों से लगातार दूर होती जा रही है. ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में बच्चों और युवाओं को धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों से जोड़ना सबसे अनिवार्य आवश्यकता है. यदि परिवार के बड़े बुजुर्ग स्वयं धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलेंगे, तो आने वाली पीढ़ी स्वतः ही संस्कारी, मर्यादित और अनुशासित बनेगी. इस धर्मसभा के दौरान पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहा. कार्यक्रम के समापन पर सभी श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से मंगल पाठ कर विश्व शांति की कामना की.

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लेखक के बारे में

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दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में Prabhat Khabar डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पत्रकारिता में परास्नातक तथा टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से हिंदी साहित्य में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें पढ़ने, लेखन और कविता-सृजन में विशेष रुचि है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे Dainik Jagran में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।

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