किशनगंज: तेरापंथ भवन में श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुआ संवत्सरी महापर्व, 'मिच्छामि दुक्कड़म्' बोल मांगी क्षमा

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क्षमा दिवस पर उपस्थित श्रद्धालु. | Prabhat Khabar Network

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किशनगंज के तेरापंथ भवन में पर्यूषण महापर्व के आठवें और नौवें दिन संवत्सरी और क्षमापना महापर्व श्रद्धापूर्वक संपन्न हुए. इन आयोजनों ने आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और परस्पर मैत्री का गहरा संदेश दिया.

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किशनगंज के तेरापंथ भवन में पर्यूषण महापर्व के अष्टम और नवम दिवस के कार्यक्रम श्रद्धा, साधना, आत्मचिंतन और क्षमाभाव के साथ संपन्न हुए. आचार्य महाश्रमण की अनुकंपा तथा उपासक महावीर दुगड़ और झाबर दुगड़ के सान्निध्य में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में श्रावक समाज ने आत्मशुद्धि, संयम और परस्पर मैत्री का संदेश ग्रहण किया. अष्टम दिवस पर संवत्सरी महापर्व और नवम दिवस पर क्षमापना महापर्व के आयोजन ने पर्व के आध्यात्मिक पक्ष को सामने रखा.

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संवत्सरी महापर्व में आत्मावलोकन और प्रतिक्रमण पर रहा जोर

पर्यूषण महापर्व के अष्टम दिवस पर संवत्सरी महापर्व का शुभारंभ नवकार महामंत्र के स्मरण के साथ हुआ. महिला मंडल की ओर से मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया. इसके बाद उपासक महावीर दुगड़ और झाबर दुगड़ ने संवत्सरी महापर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला. उपासकों ने संवर और निर्जरा के मर्म को सरल भाषा में समझाते हुए बताया कि संवर के माध्यम से नए कर्मों के आगमन को रोकने का प्रयास किया जाता है, जबकि निर्जरा के जरिए तप, संयम और साधना के माध्यम से पूर्व संचित कर्मों के क्षय की भावना रखी जाती है. संवत्सरी का पर्व व्यक्ति को अपने आचरण और कर्मों का निष्पक्ष आत्मावलोकन करने तथा आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.

भगवान महावीर की 27 भवों की यात्रा का भावपूर्ण विवेचन

कार्यक्रम के दौरान भगवान महावीर स्वामी की 27 भवों की आध्यात्मिक विकास यात्रा का भावपूर्ण विवेचन किया गया. महिला मंडल की ओर से गीतिकाओं और प्रेरक प्रसंगों की प्रस्तुति दी गई. इनके माध्यम से भगवान महावीर की तपस्या, त्याग, संयम और साधना की यात्रा को श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत किया गया. कार्यक्रम में शामिल श्रद्धालुओं ने धार्मिक प्रसंगों और प्रस्तुतियों के माध्यम से भगवान महावीर के जीवन से जुड़े आध्यात्मिक संदेशों को समझने का प्रयास किया. आयोजन के दौरान पूरे तेरापंथ भवन में धार्मिक और साधनापूर्ण वातावरण बना रहा.

संध्याकालीन प्रतिक्रमण में की गई आत्मशुद्धि की साधना

संवत्सरी महापर्व के अवसर पर संध्याकालीन संवत्सरी प्रतिक्रमण का भी आयोजन किया गया. इसका शुभारंभ त्रिपदी वंदना के साथ हुआ. प्रतिक्रमण के दौरान उपस्थित श्रावक समाज ने वर्षभर में जाने-अनजाने में हुई गलतियों और अपराधों का आत्मावलोकन किया. धार्मिक परंपरा के अनुसार प्रतिक्रमण आत्मनिरीक्षण और प्रायश्चित की साधना से जुड़ा है. इसी भावना के साथ श्रद्धालुओं ने अपनी भूलों के लिए प्रायश्चित और क्षमायाचना की. कार्यक्रम के दौरान एक-दूसरे से क्षमा मांगते हुए "मिच्छामि दुक्कडम्" की भावना व्यक्त की गई.

क्षमाभाव और मैत्री के संदेश के साथ आगे बढ़ा पर्व

पर्यूषण महापर्व के अष्टम और नवम दिवस के आयोजनों में आत्मचिंतन के साथ क्षमा और मैत्री को विशेष महत्व दिया गया. संवत्सरी के माध्यम से जहां अपने आचरण का मूल्यांकन करने और गलतियों के लिए प्रायश्चित की भावना सामने आई, वहीं क्षमापना महापर्व पर आपसी कटुता और मनमुटाव को दूर कर मैत्रीपूर्ण संबंधों की भावना को महत्व दिया गया. आयोजन से जुड़े लोगों के अनुसार पर्यूषण महापर्व का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी गतिविधियों के साथ अपने भीतर भी झांकने और आत्मसंयम की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देना है. इसी क्रम में संवत्सरी और क्षमापना के कार्यक्रमों को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया जाता है.

तेरापंथ भवन में श्रद्धा और साधना का बना रहा माहौल

दोनों दिवसों के कार्यक्रमों में श्रावक समाज की सहभागिता रही. नवकार महामंत्र के स्मरण, मंगलाचरण, आध्यात्मिक विवेचन, गीतिकाओं, प्रेरक प्रसंगों और प्रतिक्रमण के माध्यम से पर्यूषण महापर्व के संदेश को प्रस्तुत किया गया. कार्यक्रमों के दौरान आत्मशुद्धि, संयम, प्रायश्चित, क्षमा और परस्पर मैत्री जैसे मूल भावों पर जोर रहा. संवत्सरी महापर्व के समापन के साथ श्रद्धालुओं ने अपने जीवन में आत्मावलोकन और क्षमाभाव को अपनाने का संकल्प लिया.

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