सीमांचल के खेतों से क्यों सिमट रहा है 'पटसन'? मेहनत और लागत के बाद भी कीमत का भरोसा न होना सबसे बड़ी वजह
खेतों में काम करते पटसन किसान | Prabhat Khabar Network
सीमांचल के ग्रामीण इलाकों में कभी शान से लहराने वाली पटसन (जूट) की फसल अब सिमट रही है. किसानों का इस पारंपरिक खेती से मोहभंग होने के पीछे भारी लागत, कड़ी मेहनत और बाजार में उचित मूल्य न मिलना सबसे बड़ी वजह है. जानिए क्यों किसान पटसन की खेती से मुंह मोड़ रहे हैं.
सीमांचल के ग्रामीण इलाकों में कभी बरसात का मौसम शुरू होते ही चारों तरफ पटसन (जूट) की लहलहाती फसलें नजर आती थीं. लेकिन समय के साथ अब पटसन की यह खेती इक्के-दुक्के खेतों तक ही सिमटकर रह गई है. किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड में किसानों का पटसन की पारंपरिक खेती से लगातार मोहभंग हो रहा है. इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह फसल तैयार करने की भारी लागत व कड़ी मेहनत के बावजूद बाजार में उचित कीमत न मिल पाना और भाव का टूटता भरोसा है.
भारी मेहनत और पानी में सड़ाने की जटिल प्रक्रिया
पटसन की खेती कोई आसान काम नहीं है. किसान बताते हैं कि खेत की जुताई और बुआई से लेकर निराई-गुड़ाई तक काफी खर्च और श्रम लगता है. फसल कटाई के बाद रेशा निकालने के लिए पटसन के डंठलों को कई दिनों तक पानी में सड़ाना पड़ता है. इसके बाद पानी के बीच खड़े होकर छाल से रेशा अलग करना, उसे धोना और सुखाना एक बेहद जटिल व श्रमसाध्य प्रक्रिया है. इतनी हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी जब किसान बाजार पहुंचता है, तो उसे अपनी उपज का सही मूल्य मिलेगा या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं होती.

बाजार का अनिश्चित भाव और मजबूरी की बिक्री
खेती में लागत पहले लग जाती है, लेकिन जब बिक्री का समय आता है तो जूट मिलों और स्थानीय बाजारों में भाव अचानक गिर जाते हैं. किसानों के पास अपनी उपज को लंबे समय तक रोककर रखने का विकल्प नहीं होता, क्योंकि उन्हें घर के दैनिक खर्च निपटाने, मजदूरों की दिहाड़ी देने और कर्ज चुकाने की जल्दी होती है. इस अनिश्चितता के चलते किसान मजबूरी में औने-पौने दामों पर अपना जूट बेचने को विवश हो जाते हैं.
मौसम का जोखिम और फसल बदलने की मजबूरी
बाजार के उतार-चढ़ाव के साथ-साथ प्राकृतिक मार भी किसानों की कमर तोड़ देती है. कम बारिश में फसल का विकास रुक जाता है, तो वहीं अत्यधिक बारिश या जलजमाव से सड़न का खतरा बढ़ जाता है. कभी सीमांचल में पटसन को मुख्य नकदी फसल (Cash Crop) माना जाता था, जिससे किसानों के बड़े-बड़े काम निकल जाते थे. अब किसान लागत और मुनाफे का गणित लगाकर उन फसलों का रुख कर रहे हैं जिनमें जोखिम कम और दाम का भरोसा ज्यादा हो. पटसन का खेतों से गायब होना किसानों की पसंद का बदलाव नहीं, बल्कि व्यवस्था और बाजार से टूटे भरोसे की कहानी है.
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लेखक के बारे में
By बच्छराज
बच्छराज प्रिंट माध्यम में 25 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. ठाकुरगंज (किशनगंज) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक कार्यों, शिक्षा, राजनीति व खेल में रुचि रखते हैं.
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