पुरानी गांव की याद दिला रही किले जैसी खड़ी कुआं, गंगा के कटाव की विभीषिका बयां कर रहा धरोहर
दियारा में कटाव की बयां करती तस्वीर, किले जैसी खड़ी कुआं
Ganga River Erosion: कटिहार जिले के अमदाबाद प्रखंड में गंगा नदी की उपधारा के बीच कुतुब मीनार की तरह अकेला खड़ा एक सदी पुराना कुआं इलाके में हुए भीषण कटाव की दर्दनाक दास्तान बयां कर रहा है. वर्ष 2007 में आई आपदा में पूरा चौक चामा गांव नदी के गर्भ में विलीन हो गया था, लेकिन यह कुआं आज भी विस्थापितों के जख्मों को कुरेदने के लिए अडिग खड़ा है.
कटिहार (अमदाबाद) से मनोज कुमार की रिपोर्ट
Ganga River Erosion: बिहार के सीमांचल प्रक्षेत्र अंतर्गत कटिहार जिले का अमदाबाद प्रखंड हर साल नदियों के बहाव और कटाव की दोहरी मार झेलने को अभिशप्त है. प्रखंड की दक्षिणी करीमुल्लापुर पंचायत के चौक चामा गांव का वजूद भले ही अब नक्शे से मिट चुका हो, लेकिन वहां की एक ऐतिहासिक धरोहर आज भी प्रशासनिक उदासीनता और प्रकृति के तांडव की गवाही दे रही है. गंगा नदी की उपधारा के तेज बहाव के बीचों-बीच किसी किले की मीनार की तरह खड़ा एक कुआं विस्थापित हो चुके ग्रामीणों को उनके खुशहाल अतीत की याद दिला रहा है. कभी घनी आबादी के बीच स्थित यह सार्वजनिक कुआं अब पानी के तेज थपेड़ों के बीच अकेला खड़ा है, जिसकी दीवारें जमीन से करीब 30 फीट ऊपर दिखाई देती हैं.
तीन किलोमीटर दूर बहती थी गंगा; 2000 के दशक में शुरू हुई तबाही
इस प्रक्षेत्र की भौगोलिक विसंगति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की मुख्य कड़ियां बेहद भावुक करने वाली हैं. बुजुर्गों और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों के अनुसार, एक समय ऐसा था जब चौक चामा गांव से गंगा नदी की वास्तविक दूरी करीब तीन से चार किलोमीटर हुआ करती थी. यह एक समृद्ध और बड़ा गांव था, जहां एक हजार से अधिक परिवार मिल-जुलकर रहते थे.
वर्ष 2000 के दशक में गंगा ने अपना रुख बदलना शुरू किया और उपजाऊ कृषि भूमि को काटते हुए धीरे-धीरे आबादी के करीब आ पहुंची. साल 2007 में नदी ने ऐसा विकराल रूप धारण किया कि पूरा चौक चामा गांव कटाव की जद में आकर नदी के गर्भ में समा गया. इस विभीषका के कारण करीब ढाई सौ परिवार एक ही झटके में बेघर हो गए और उन्हें अपनी पैतृक जमीन छोड़कर अन्यत्र पलायन करना पड़ा.
वर्ष 1914 में राम जन्म सिंह ने कराया था निर्माण; जब चापाकल भी नहीं होते थे
“स्थानीय ग्रामीण जालंधर सिंह, मुकेश कुमार सिंह, मनोज सिंह, श्याम चौधरी, खोखा सिंह और जयराम सिंह ने बताया कि यह कुआं वर्ष 1914 में निर्मित हुआ था. उस दौर में इलाके में चापाकल (हैंडपंप) नहीं होते थे और पूरा गांव पानी के लिए राम जन्म सिंह के दरवाजे पर बने इसी कुएं पर निर्भर था. आज गांव तो खत्म हो गया, लेकिन यह कुआं जस का तस खड़ा रहकर हमारे पूर्वजों की यादों और कटाव के दर्द को हर दिन ताजा करता है.”
दर्जन भर गांव हो चुके हैं विलीन; स्थायी समाधान का आज भी इंतजार
अमदाबाद प्रखंड की कड़ियों को देखा जाए तो यह क्षेत्र गंगा और महानंदा नदी के दोहरे बहाव क्षेत्र से प्रभावित है. पूर्व में हुए भीषण कटाव के कारण जामुनतल्ला, गोलाघाट, नवरसिया, धन्नी टोला और खट्टी किशनपुर जैसे खुशहाल गांव पूरी तरह नदी में विलीन हो चुके हैं. वर्तमान समय में भी कीर्ति टोला, युसूफ टोला, बबला बन्ना, झब्बू टोला और मेघु टोला जैसे कई रिहायशी इलाके कटाव के बिल्कुल मुहाने पर खड़े हैं.
यद्यपि जल संसाधन विभाग द्वारा समय-समय पर कनिष्ठ व वरिष्ठ अभियंताओं की निगरानी में कटाव निरोधात्मक कार्य और जियो बैग डालने की कमान संभाली जाती है, लेकिन ये तमाम प्रयास अस्थाई साबित हुए हैं. बाढ़ और कटाव के स्थाई समाधान की आस में तटवर्ती प्रक्षेत्र के किसानों और कली-मजदूरों की आंखें पथरा गई हैं, लेकिन स्थायी मुस्तैदी कब दिखेगी, यह आज भी एक अनुत्तरित यक्ष प्रश्न बना हुआ है.
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By Divyanshu Prashant
दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में Prabhat Khabar डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पत्रकारिता में परास्नातक तथा टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से हिंदी साहित्य में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें पढ़ने, लेखन और कविता-सृजन में विशेष रुचि है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे Dainik Jagran में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।
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