चार सितंबर को मनेगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रोहिणी नक्षत्र में आधी रात जन्मोत्सव, जानें व्रत का महत्व और शास्त्रीय मान्यता
पंडित अनिल मिश्रा. | Prabhat Khabar Network
इस वर्ष 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, जो रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के शुभ संयोग में होगी. जानिए इस विशेष पर्व का महत्व और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की विधि-विधान.
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग में भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण की शास्त्र सम्मत मान्यता के आधार पर जन्माष्टमी व्रत एवं कृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है. इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व चार सितंबर, शुक्रवार को मनाया जायेगा. यह जानकारी रामचंद्रडीह पंचायत अंतर्गत हेठचकाई निवासी सह दुर्गा मंदिर गोला, चकाई के पुजारी पंडित अनिल मिश्रा ने दी.
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अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का खास संयोग
पंडित अनिल मिश्रा ने बताया कि शास्त्रों में कहा गया है, “रोहिणी योगे प्रशस्त निशीथे व्यापिण्यां अष्टम्यां भवेत”. इसका अर्थ है कि भाद्रपद कृष्ण पक्ष में जिस दिन अर्धरात्रि के समय रोहिणी नक्षत्र से युक्त अष्टमी तिथि हो, उसी दिन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनायी जाती है.
उन्होंने बताया कि इस वर्ष यह विशेष संयोग चार सितंबर को बन रहा है. इसी वजह से इस दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव श्रद्धा और विधि-विधान के साथ मनायेंगे. मंदिरों में दिनभर पूजा-अर्चना और भक्ति का माहौल रहने के साथ रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा एवं आरती का आयोजन किया जायेगा.
कलियुग में विशेष फलदायी माना गया है व्रत
पंडित अनिल मिश्रा ने कहा कि सनातन धर्म में जन्माष्टमी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक ग्रंथों में इस व्रत को अत्यंत फलदायी माना गया है. भविष्य पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर से जन्माष्टमी व्रत के महत्व का वर्णन किया था. मान्यता है कि एक जन्माष्टमी व्रत का फल हजारों एकादशी व्रत के समान बताया गया है.
सौ जन्मों के पापों से मुक्ति की मान्यता
ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी जन्माष्टमी व्रत की महिमा का वर्णन मिलता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत करने वाले व्यक्ति को पूर्व जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है.
पंडित मिश्रा ने कहा कि विशेष रूप से कलियुग में जन्माष्टमी व्रत का महत्व और अधिक माना गया है. भगवान श्रीकृष्ण के प्रति आस्था रखने वाले श्रद्धालुओं को इस दिन श्रद्धा, संयम और विधि-विधान के साथ व्रत रखकर भगवान का जन्मोत्सव मनाना चाहिए.
आधी रात में होगा कान्हा का जन्मोत्सव
जन्माष्टमी पर श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करेंगे. अर्धरात्रि में भगवान के जन्म का उत्सव मनाया जायेगा. मंदिरों में भगवान के बाल स्वरूप का विशेष श्रृंगार, आरती और भोग लगाया जायेगा. कृष्ण जन्म के बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण भी किया जायेगा.
चार सितंबर को बनने वाले अष्टमी-रोहिणी संयोग को लेकर श्रद्धालुओं में अभी से उत्साह है. मंदिरों में जन्माष्टमी की तैयारियां भी शुरू होने लगी हैं और कृष्ण जन्मोत्सव को भव्य बनाने की तैयारी की जा रही है.
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