12 दिन में उजड़ गया पूरा परिवार, पहले मां फिर पिता की मौत, श्राद्ध में ढाई लाख खर्च के बाद बेटे पर फिर कर्ज का बोझ
मां का श्राद्ध करते हुए रमेश का फाइल फोटो. | Prabhat Khabar Network
बरहट के नूमर गांव में एक परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़. पत्नी की मौत के 12 दिन बाद पति का भी हृदय गति रुकने से निधन हो गया. माता-पिता दोनों को खोने के गम के साथ अब बेटे पर श्राद्ध और कर्ज का बोझ आ पड़ा है.
बरहट. प्रखंड क्षेत्र के नूमर गांव में एक परिवार पर ऐसा दुख टूटा कि संभलने का मौका तक नहीं मिला. पत्नी की मौत के महज 12 दिन बाद पति की भी हृदय गति रुकने से मौत हो गयी. पहले मां का साया उठा और परिवार उनके निधन के सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि पिता की मौत ने सभी को झकझोर कर रख दिया. एक के बाद एक हुई दो मौतों से पूरा गांव शोक में डूब गया है.
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5 अगस्त को मां की मौत, 17 अगस्त को पिता भी चल बसे
नूमर गांव निवासी रीता देवी (65) की अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद 5 अगस्त को मौत हो गयी थी. परिजनों ने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार सुल्तानगंज घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया. इसके बाद परिवार ने श्राद्ध कार्यक्रम भी संपन्न कराया.
मां के निधन के बाद परिवार अभी शोक और जिम्मेदारियों से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि 17 अगस्त को एक और दुखद खबर सामने आ गयी. रीता देवी के पति शाहदेव यादव (70) की अचानक हृदय गति रुकने से मौत हो गयी.
बताया गया कि परिवार के लोग श्राद्ध कार्यक्रम पूरा होने के बाद गंगा स्नान के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे. इसी दौरान शाहदेव यादव की अचानक तबीयत बिगड़ी और उनकी मौत हो गयी. कुछ ही दिनों के अंतराल में पति-पत्नी दोनों की मौत से परिवार में चीख-पुकार मच गयी.
मां के श्राद्ध में खर्च हो गये ढाई लाख
मृतक के पुत्र रमेश कुमार यादव के सामने अब माता-पिता दोनों की यादें हैं, लेकिन उन्हें पुकारने वाला कोई नहीं. रमेश ने बताया कि परिवार मेहनत-मजदूरी कर किसी तरह अपना घर चलाता है.
उन्होंने बताया कि मां के निधन के बाद श्राद्ध कार्यक्रम में करीब ढाई लाख रुपये खर्च हो गये. परिवार अभी इस खर्च से उबर भी नहीं पाया था कि पिता की मौत हो गयी. अब पिता के अंतिम संस्कार और श्राद्ध की जिम्मेदारी भी उनके सामने खड़ी है.
माता-पिता खोने का दर्द और कर्ज की चिंता
रमेश कुमार यादव कहते हैं कि माता-पिता दोनों को खोने का दर्द ऐसा है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है. एक तरफ घर के दो बुजुर्गों के चले जाने का गम है, तो दूसरी तरफ पिता के श्राद्ध की जिम्मेदारी सामने है.
परिवार के पास जमा पूंजी नहीं है और आमदनी का भी कोई मजबूत साधन नहीं है. ऐसे में पिता के श्राद्ध के लिए भी कर्ज लेने की नौबत आ गयी है. माता-पिता दोनों की मौत के सदमे के बीच सामाजिक परंपराओं को निभाने का आर्थिक दबाव परिवार की परेशानी और बढ़ा रहा है.
12 दिनों में दो अर्थियां, घर में पसरा सन्नाटा
जिस घर में पति-पत्नी की मौजूदगी से परिवार की जिंदगी चलती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है. महज 12 दिनों के भीतर दो अर्थियां उठने से परिवार की पूरी दुनिया उजड़ गयी.
घटना से गांव के लोग भी स्तब्ध हैं. हर आंख नम है और लोग परिवार को ढांढस बंधाने में जुटे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि एक परिवार पर इतनी कम अवधि में दोहरी मौत का दुख टूटना बेहद पीड़ादायक है.
यह सिर्फ पति-पत्नी की लगातार हुई मौत की कहानी नहीं है. यह उस परिवार की बेबसी भी सामने लाती है, जिसने कुछ ही दिनों में अपने माता-पिता को खो दिया और अब उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारियों के साथ आर्थिक संकट का भी सामना करना पड़ रहा है.
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