खेती के साथ तालाब से कमाई की राह, जमुई में आदिवासी किसानों को सिखायी गयी व्यावसायिक मछली पालन की तकनीक

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मौके पर उपस्थित महिला किसान व अन्य | Prabhat Khabar Network

जमुई के आदिवासी किसानों को खेती के साथ-साथ मछली पालन से दोगुनी कमाई का रास्ता दिखाया गया है. विशेषज्ञों ने उन्हें वैज्ञानिक तरीके सिखाए, जिससे आय और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे.

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Fish Farming in Jamui: जमुई में खेती के साथ अगर तालाब से भी कमाई होने लगे तो किसान की आमदनी बढ़ सकती है. इसी संभावना को देखते हुए जमुई में आदिवासी समुदाय के किसानों को व्यावसायिक मछली पालन की ओर बढ़ने के लिए जागरूक किया गया. कृषि विज्ञान केंद्र, जमुई और मात्स्यिकी महाविद्यालय, किशनगंज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किसान गोष्ठी में करीब 100 किसानों ने हिस्सा लिया.

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कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन सिर्फ अतिरिक्त आमदनी का जरिया नहीं, बल्कि रोजगार और आत्मनिर्भरता का बेहतर विकल्प भी बन सकता है. किसानों को तालाब प्रबंधन से लेकर मछलियों के सही प्रजाति चयन और उत्पादन बढ़ाने की तकनीक तक की जानकारी दी गयी.

खेती के साथ मछली पालन से बढ़ सकती है आमदनी

कृषि विज्ञान केंद्र, जमुई के प्रमुख डॉ सुधीर कुमार सिंह ने किसान गोष्ठी के उद्घाटन सत्र में कहा कि मछली पालन रोजगार का बेहतर विकल्प हो सकता है. इसके जरिये किसान अपनी आय बढ़ाकर आत्मनिर्भर बन सकते हैं.

उन्होंने कहा कि बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पटना जमुई जिले में मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए कृत संकल्पित है. कुलपति डॉ इंद्रजीत सिंह के दिशा-निर्देश पर मात्स्यिकी महाविद्यालय, किशनगंज और कृषि विज्ञान केंद्र, जमुई संयुक्त कार्य योजना बनाकर इस दिशा में काम कर रहे हैं.

आदिवासी किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है व्यावसायिक मत्स्य पालन

गोष्ठी का खास फोकस जिले के आदिवासी समुदाय के किसानों पर रहा. किसानों को बताया गया कि उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर मत्स्य पालन को व्यवसाय के रूप में विकसित किया जा सकता है.

विशेषज्ञों ने व्यावसायिक मछली पालन की संभावनाओं और इससे होने वाले आर्थिक लाभ की जानकारी दी. किसानों को आधुनिक तकनीक के बारे में भी बताया गया, ताकि वे परंपरागत तरीके से आगे बढ़कर वैज्ञानिक पद्धति अपना सकें.

मछली पालन से जुड़ी किसानों की समस्याओं को भी कार्यक्रम में सुना गया. विशेषज्ञों ने उनके सवालों का जवाब देते हुए संभावित समाधान की जानकारी दी.

तालाब प्रबंधन से लेकर मछली की प्रजाति तक समझाया

कार्यक्रम में डॉ आरके सिंह ने किसानों को मछली पालन के विभिन्न पहलुओं की विस्तार से जानकारी दी.

उन्होंने तालाब प्रबंधन को बेहतर बनाने, मछलियों की उपयुक्त प्रजातियों के चयन, पालन की तकनीक और बेहतर उत्पादन के लिए जरूरी सावधानियों के बारे में बताया.

विशेषज्ञों ने किसानों को यह समझाने की कोशिश की कि मछली पालन में सिर्फ तालाब होना पर्याप्त नहीं है. बेहतर उत्पादन के लिए तालाब का प्रबंधन, सही प्रजाति का चयन और पालन की वैज्ञानिक तकनीक भी महत्वपूर्ण है.

किसानों की समस्याओं का भी निकाला समाधान

गोष्ठी के दौरान किसानों ने मछली पालन से जुड़ी अपनी समस्याएं विशेषज्ञों के सामने रखीं. विशेषज्ञों ने सवालों के जवाब देते हुए किसानों को आवश्यक जानकारी दी.

इस तरह कार्यक्रम सिर्फ जागरूकता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों को व्यावसायिक मत्स्य पालन शुरू करने और उसे बेहतर तरीके से संचालित करने से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी भी दी गयी.

कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से किसानों को आगे भी तकनीकी सहयोग और प्रशिक्षण से जोड़ने की बात कही गयी.

आने वाले महीनों में होंगे प्रशिक्षण कार्यक्रम

केंद्र प्रमुख डॉ सुधीर कुमार सिंह ने बताया कि आने वाले महीनों में जिले के आदिवासी समुदाय के किसानों के लिए मात्स्यिकी महाविद्यालय, किशनगंज के सहयोग से मछली पालन से संबंधित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे.

इन कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक तरीके से मत्स्य पालन के लिए प्रशिक्षित करना है. इसके जरिये उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार का बेहतर अवसर उपलब्ध कराने की कोशिश की जायेगी.

अगर प्रशिक्षण के साथ किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार से जुड़ी जानकारी मिलती है तो मछली पालन को छोटे स्तर से व्यावसायिक गतिविधि में बदलने में मदद मिल सकती है.

Fish Farming in Jamui: करीब 100 किसानों ने लिया हिस्सा

किसान गोष्ठी में करीब एक सौ किसानों ने भाग लिया. कार्यक्रम में डॉ प्रवीण कुमार, डॉ आर सिंह, मीरा देवी, झाड़ी मरांडी, बाबूलाल हेम्ब्रम और बरकी हांसदा सहित अन्य लोग मौजूद रहे.

आयोजकों के अनुसार जिले में मछली पालन को बढ़ावा देने की दिशा में यह पहल किसानों को पारंपरिक खेती के साथ आय के अतिरिक्त साधन से जोड़ने की कोशिश है.

जमुई के आदिवासी किसानों के लिए आने वाले महीनों में होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम इस पहल की अगली कड़ी होंगे. अब देखना यह होगा कि जागरूकता और प्रशिक्षण के बाद कितने किसान व्यावसायिक मत्स्य पालन को अपनाकर इसे अपनी आय और रोजगार का स्थायी माध्यम बना पाते हैं.

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