7 महीने में सिर्फ 24 आंखों के ऑपरेशन, गोपालगंज सदर अस्पताल में 2-2 सर्जन फिर भी जुलाई माह में 1 ही सर्जरी

Author Manish Raj|Edited by Sakshi Kumari
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फोटो ,सदर अस्पताल की ओपीडी में मरीज की नेत्र जांच करते डॉ. सुनील कुमार. फोटो ,नेत्र ओटी वार्ड की तस्वीर    | Prabhat Khabar Network

नेत्र ओटी वार्ड की तस्वीर

Gopalganj Sadar Hospital : गोपालगंज के सदर अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में पिछले सात महीनों में चौंकाने वाले कम ऑपरेशन हुए हैं. मात्र 24 मोतियाबिंद ऑपरेशन का आंकड़ा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

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Gopalganj Sadar Hospital : बिहार के गोपालगंज जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की सुस्त रफ्तार को उजागर करने वाली खबर सामने आई है. सदर अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में पिछले सात महीनों में मोतियाबिंद सहित आंखों के मात्र 24 ऑपरेशन हुए हैं. दो बड़े नेत्र सर्जन की तैनाती के बावजूद मरीजों को सही से लाभ नहीं मिल पा रहा है. इस आंकड़े ने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

सात महीने में महज 24 मरीजों की हुई सर्जरी

सदर अस्पताल के नेत्र रोग विभाग के आंकड़े काफी निराशाजनक हैं. उपलब्ध आंकड़ों पर नजर डालें तो जनवरी से जुलाई तक केवल 24 मरीजों का ही ऑपरेशन हो पाया है. जनवरी में 12, फरवरी में 9, अप्रैल में 2 और जुलाई में मात्र 1 मरीज का ऑपरेशन किया गया. मार्च, मई और जून में तो यह आंकड़ा शून्य रहा.

रोजाना ओपीडी में पहुंचते हैं 10 से 15 मरीज

अस्पताल में मरीजों की कमी नहीं है. सदर अस्पताल में तैनात नेत्र सहायक अरुण कुमार के मुताबिक, प्रतिदिन ओपीडी में 10 से 15 मरीज अपनी आंखों का इलाज कराने आते हैं. इनमें से अधिकतर मोतियाबिंद या अन्य गंभीर नेत्र रोगों के शिकार होते हैं. डॉक्टरों द्वारा उन्हें ऑपरेशन की सलाह भी दी जाती है, लेकिन असलियत में वे ऑपरेशन टेबल तक नहीं पहुंच पाते हैं.

दो सर्जनों की तैनाती के बाद भी यह हाल क्यों?

अस्पताल में डॉक्टरों की कोई कमी नहीं है. नेत्र विभाग में दो अनुभवी नेत्र सर्जन, डॉ. राकेश कुमार और डॉ. एसके गुप्ता तैनात हैं. इनके रहने के बावजूद अपेक्षित संख्या में सर्जरी का न होना एक बड़ा चिंता का विषय है. स्वास्थ्य विभाग दावा करता है कि सरकारी स्तर पर मोतियाबिंद ऑपरेशन की पूरी सुविधा है, फिर भी परिणाम शून्य के बराबर हैं.

जागरूकता की कमी और प्रबंधन की लापरवाही

इस खराब प्रदर्शन के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय जानकारों का मानना है कि मरीजों में जागरूकता की भारी कमी है. इसके अलावा अस्पताल में समय-समय पर आने वाली तकनीकी और प्रबंधन संबंधी समस्याएं भी एक बड़ी रुकावट हैं. इसी वजह से लोग सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन कराने से कतराते हैं.

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