मौत के फंदे से भाई-बहन के प्यार तक, बक्सर जेल में आठ कैदियों ने तैयार की राखियां
बक्सर जेल के सजा पार बंदियों द्वारा बनाई गई राखी
बक्सर केंद्रीय कारा के कैदी अब फांसी का फंदा नहीं, बल्कि रक्षाबंधन के लिए सुंदर राखियां बना रहे हैं। जानिए कैसे जेल प्रशासन बंदियों को आत्मनिर्भर बना रहा है।
बक्सर केंद्रीय कारा की पहचान कभी ‘मनीला रस्से’ यानी फांसी के फंदे के निर्माण के लिए रही है. अब इसी जेल की दीवारों के पीछे बंदियों के हाथ उम्मीद और सृजन की नई कहानी लिख रहे हैं. रक्षाबंधन के अवसर पर जेल में बंद सजायाफ्ता कैदियों ने आकर्षक और रंग-बिरंगी राखियां तैयार की हैं. जुर्म और सजा से जुड़ी पहचान के बीच यह पहल सुधार और आत्मनिर्भरता का संदेश दे रही है.
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1844 से औद्योगिक सफर का गवाह है बक्सर जेल
बक्सर केंद्रीय कारा का औद्योगिक इतिहास करीब 182 वर्षों पुराना है. शाहाबाद जिला गजेटियर के अनुसार, वर्ष 1844 में यहां सूती वस्त्र निर्माणशाला स्थापित की गई थी. इसके बाद 1880 के दशक में रस्सा निर्माणशाला शुरू हुई. फिलीपींस की राजधानी मनीला के नाम पर तैयार होने वाला ‘मनीला रस्सा’ बक्सर जेल की खास पहचान बन गया.
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‘मनीला रस्से’ से राखी तक बदली पहचान
बक्सर जेल में तैयार होने वाला मनीला रस्सा देश में फांसी के फंदे के तौर पर इस्तेमाल होने के कारण चर्चित रहा है. अब इसी कारागार में बंदियों के हाथ राखियों को आकार दे रहे हैं. यह बदलाव जेल में सजा के साथ सुधार और पुनर्वास की सोच को भी दर्शाता है.
आठ बंदियों ने तैयार कीं आकर्षक राखियां
इस रक्षाबंधन पर बक्सर केंद्रीय कारा के आठ सजायाफ्ता बंदियों ने राखियां तैयार की हैं. पटना बाजार से मंगाए गए कच्चे माल से पुरुष बंदियों ने रंग-बिरंगी और आकर्षक राखियां बनाई हैं. इन राखियों में बंदियों की मेहनत और कारीगरी साफ नजर आती है.
15 से 30 रुपये तक रखी गई कीमत
कारागार प्रशासन ने इन राखियों की कीमत 15 से 30 रुपये के बीच तय की है. कम कीमत रखने का उद्देश्य आम लोगों तक इन राखियों को पहुंचाना है. राखी खरीदकर लोग न सिर्फ भाई-बहन के रिश्ते के त्योहार को खास बना सकते हैं, बल्कि बंदियों के हुनर को प्रोत्साहन भी दे सकते हैं.

तीन जगहों पर मिलेंगी बंदियों की राखियां
बंदियों द्वारा तैयार राखियों की बिक्री के लिए तीन प्रमुख स्थान तय किए गए हैं. बक्सर केंद्रीय कारा के ‘मुक्ति आउटलेट’ के अलावा पटना स्थित आदर्श केंद्रीय कारा, बेउर और खादी मॉल में भी राखियां भेजी गई हैं. दोनों स्थानों पर करीब 500-500 राखियां उपलब्ध कराई गई हैं.
राखी के जरिए आत्मनिर्भरता की पहल
जेल प्रशासन का उद्देश्य बंदियों को सिर्फ सजा देना नहीं, बल्कि उन्हें रोजगारपरक कौशल से जोड़ना भी है. सिलाई, बुनाई और हस्तशिल्प जैसे कामों के प्रशिक्षण से बंदियों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जा रही है. राखियों की बिक्री से मिलने वाला पारिश्रमिक उनके परिवारों के लिए आर्थिक सहारा भी बन रहा है.
सजा के फंदे से उम्मीद की डोर तक
बक्सर केंद्रीय कारा की यह पहल उसकी पुरानी पहचान को एक नया अर्थ देती है. जिस जेल का नाम कभी फांसी के ‘मनीला रस्से’ से जुड़ा था, वहीं अब बंदियों के हाथ भाई-बहन के प्रेम की राखियां तैयार कर रहे हैं. सजा के फंदे से उम्मीद की डोर तक का यह सफर सुधारात्मक न्याय और पुनर्वास की एक अलग तस्वीर पेश करता है.
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