हिलसा में भागवत कथा का सातवां दिन, माता-पिता और गौ माता की सेवा का दिलाया संकल्प

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वृंदावन के कृष्णा जी महाराज ने श्रोताओं से गौ सेवा का वचन लिया | Prabhat Khabar Network

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भागवत कथा के सातवें दिन वृंदावन के कृष्णा जी महाराज ने श्रोताओं को माता-पिता, गुरुजनों और गौ माता की सेवा का संकल्प दिलाया. उन्होंने 17 दिसंबर को होने वाली 'गौ सम्मान अभियान रैली' में शामिल होने की भी अपील की.

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Bhagwat Katha: हिलसा शहर के डाकबंगला स्थित पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन आश्रम में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन शनिवार देर शाम वृंदावन धाम के कृष्णा जी महाराज ने श्रोताओं से माता-पिता, गुरुजनों, वृद्धजनों और गौ माता की सेवा करने का वचन लिया. उन्होंने श्रोताओं से 17 दिसंबर को प्रदेश मुख्यालय में होने वाली ''गौ सम्मान अभियान रैली'' में शामिल होने की अपील की. साथ ही हस्ताक्षर अभियान से जुड़कर इसे सफल बनाने का आग्रह किया. इसका उद्देश्य गौ माता की सुरक्षा के लिए संविधान में कड़े कानून बनवाना बताया गया.

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प्रभु श्रीकृष्ण के विवाहों को वेद की ऋचाएं बताया

कथा के दौरान कृष्णा जी महाराज ने प्रभु श्रीकृष्ण के विवाहों को वेद की ऋचाएं बताया. उन्होंने कहा कि ये गृहस्थ जीवन के लिए जरूरी नियमों को मंत्रों में बांधते हैं. प्रभु ने यह भी बताया कि निस्वार्थ भाव से गृहस्थ जीवन में भगवान का नाम लेते हुए भी व्यक्ति का कल्याण हो सकता है.

उन्होंने समझाया कि कृष्ण पंच तत्वों से बने हैं, जिनसे शरीर की रचना हुई. तीन पुरुषार्थ भगवान की पटरानियां हैं. इसलिए प्रभु ने 16108 विवाह किये और सभी को अपने हृदय से लगाया.

सुदामा और कृष्ण की दोस्ती का किया वर्णन

महाराज कृष्णा जी ने सुदामा और कृष्ण की दोस्ती पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि कृष्ण द्वारिकापुरी जैसे वैभवशाली राजा थे, फिर भी उन्होंने सुदामा जैसे गरीब मित्र को अपने हृदय से लगाया. कृष्ण ने सुदामा को अपने सिंहासन पर बिठाया और अपने आंसुओं से उनके पैर धोए.

उन्होंने सवाल किया कि आज ऐसी दोस्ती क्यों नहीं दिखती. इसका कारण बताते हुए कहा कि हम भगवान को मानते तो हैं, लेकिन उनकी बातों को नहीं मानते. जब हम धन के घमंड में दूसरों को छोटा समझने लगते हैं, तो वहीं से ईश्वर की कृपा मिलनी बंद हो जाती है.

कर्म का अधिकार, छह फल ईश्वर के पास

महाराज ने कहा कि जो व्यक्ति धन के साथ अपना विकास देखता है, उसे पिछले जन्मों के कर्मों का फल मिलता है. लेकिन उसके घमंड के कारण भगवान उस फल में कमी कर देते हैं.

उन्होंने बताया कि ईश्वर ने मनुष्य को कर्म करने का अधिकार दिया है, लेकिन छह फल अपने पास रखे हैं - लाभ, हानि, जीवन, मरण, यश और अपयश. इसलिए कई बार मिलने वाला फल भी सुख की जगह कष्ट देता है.

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