नालंदा में ब्याज के बोझ तले दब रहा पैक्स, सरकार से नियम बदलने और ब्याजमुक्त ऋण की मांग

नालंदा की पैक्स समितियों पर बैंक ब्याज का भारी बोझ पड़ रहा है, जिससे वे आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं। सीएमआर भुगतान में महीनों की देरी और तय दर में 15 साल से बदलाव न होने से समितियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
Nalanda News : प्राथमिक कृषि साख समितियों (पैक्स) पर बढ़ते बैंक ब्याज और सीएमआर (कस्टम मिल्ड राइस) भुगतान में हो रही देरी को लेकर सूढ़ी पंचायत पैक्स अध्यक्ष मो. सिकंदर आजम उर्फ बिहारू आलम ने राज्य सरकार से नियमों में बदलाव की मांग की है. उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था के कारण हर वर्ष कई पैक्स समितियां आर्थिक संकट में फंस रही हैं और अध्यक्ष व प्रबंधकों पर प्राथमिकी तक दर्ज हो रही है.
48 घंटे में किसानों को भुगतान, लेकिन पैक्स को महीनों इंतजार
मो. सिकंदर आजम ने बताया कि सरकार के नियम के अनुसार धान अधिप्राप्ति के 48 घंटे के भीतर किसानों के बैंक खाते में भुगतान करना अनिवार्य है, जिसका पालन पैक्स समितियां करती हैं. लेकिन धान की मिलिंग कर सीएमआर राज्य खाद्य निगम को सौंपने के बाद समितियों को भुगतान मिलने में कई महीने लग जाते हैं. इस दौरान बैंक ऋण पर ब्याज लगातार बढ़ता रहता है.
ब्याज का बोझ बढ़ने से समितियां हो रहीं डिफॉल्टर
उन्होंने कहा कि सीएमआर भुगतान में देरी के कारण बैंक का ब्याज पैक्स को मिलने वाले कमीशन और अन्य आय से अधिक हो जाता है. ऐसी स्थिति में समितियां ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाती हैं. इसके बाद बैंक डिफॉल्टर घोषित कर अध्यक्ष और प्रबंध समिति के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर देती हैं तथा कई मामलों में प्राथमिकी भी दर्ज होती है.
किसानों को भी उठाना पड़ रहा अतिरिक्त खर्च
पैक्स अध्यक्ष ने कहा कि जब कोई समिति डिफॉल्टर घोषित हो जाती है, तो उस क्षेत्र के किसानों को दूसरे पैक्स में धान बेचने जाना पड़ता है. इससे परिवहन, भाड़ा और अन्य खर्च बढ़ जाते हैं, जिसका सीधा आर्थिक बोझ किसानों पर पड़ता है.
15 साल से नहीं बदली दर, बढ़ गए सभी खर्च
उन्होंने कहा कि वर्ष 2010-11 से पैक्स को मिलने वाली दर में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जबकि ट्रक भाड़ा, मजदूरी, मिलिंग और अन्य खर्च कई गुना बढ़ चुके हैं. अन्य राज्यों में नई दर लागू की जा चुकी है, लेकिन बिहार में अब भी पुरानी व्यवस्था लागू है.
सरकार से रखीं दो प्रमुख मांगें
मो. सिकंदर आजम ने राज्य सरकार से मांग की कि पैक्स समितियों को धान अधिप्राप्ति के लिए ब्याजमुक्त ऋण उपलब्ध कराया जाए. यदि यह संभव नहीं हो तो सीएमआर जमा होने के 48 घंटे के भीतर संबंधित पैक्स के बैंक खाते में भुगतान सुनिश्चित किया जाए, या फिर दो महीने से अधिक की देरी होने पर बैंक ब्याज की राशि भी भुगतान में शामिल की जाए. उनका कहना है कि इससे पैक्स समितियों और किसानों दोनों को राहत मिलेगी.
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By Prabhat Khabar News Desk
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