बिहारशरीफ: हिंदी हमारी सांस्कृतिक पहचान, दैनिक व्यवहार में मिले सम्मान : भगवती प्रसाद द्विवेदी

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डिग्री कॉलेज में 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति और हिंदी' पर हुआ विमर्श

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राजकीय डिग्री कॉलेज, मखदुमपुर में हिंदी दिवस के अवसर पर 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति और हिंदी' विषय पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया. वक्ताओं ने भाषा को सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर दैनिक व्यवहार में सम्मान देने का आह्वान किया.

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बिहारशरीफ. राजकीय डिग्री महाविद्यालय, मखदुमपुर में सोमवार को हिंदी दिवस के अवसर पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम का मुख्य विषय ''राष्ट्रीय शिक्षा नीति और हिंदी : वर्तमान परिदृश्य और संभावनाएं'' रहा. इसमें वक्ताओं ने हिंदी भाषा के ऐतिहासिक महत्व और राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसके भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की.

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दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्य अतिथि एवं अन्य मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया. इसके बाद सामूहिक रूप से राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का गायन हुआ. इससे कार्यक्रम का माहौल देशभक्ति और भाषाई गौरव से ओत-प्रोत हो गया. अतिथियों के मंचासीन होने के बाद डॉ. गुँजा आनंद ने सभी अतिथियों का अभिवादन करते हुए स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया.

इसके बाद डॉ. सुमन कुमारी ने ''राष्ट्रीय शिक्षा नीति और हिंदी'' विषय की रूपरेखा रखते हुए कार्यक्रम का विषय प्रवेश कराया. उन्होंने कहा कि यह महत्वपूर्ण अवसर है कि हिंदी को केवल साहित्य और भाषा अध्ययन तक सीमित न रखते हुए उच्च शिक्षा, शोध, विज्ञान, तकनीक और रोजगार से भी जोड़ा जाए.

कृष्णा कुमार ने प्रस्तुत किया काव्य पाठ

इस अवसर पर सहायक प्राध्यापक कृष्णा कुमार ने दिनकर द्वारा रचित ''रश्मिरथी कृष्ण की चेतावनी'' का ओजस्वी काव्य पाठ प्रस्तुत किया. काव्य पाठ ने उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया.

हिंदी को सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखने की जरूरत

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि हिंदी केवल संपर्क की भाषा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और ''मां के आंचल'' के समान है. इसलिए दैनिक व्यवहार में हिंदी को वही सम्मान और प्रेम मिलना चाहिए, जो हम अपनी मां को देते हैं.

उन्होंने कहा कि मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रीढ़ तोड़ने का काम किया. यह विडंबना है कि आज अमेरिका जैसे देशों में हिंदी के कोर्स चल रहे हैं, लेकिन हम अपने ही देश में अंग्रेजीयत के प्रभाव और हीन भावना से ग्रसित हैं.

उन्होंने कहा, ''भाषा बहता नीर हमारी हिंदी है, गंगा यमुना संस्कृति की लय.'' उन्होंने सभी से मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अपने भीतर छिपे साहित्यकार को बाहर लाने, हिंदी का राजनीतिकरण नहीं करने और इसे स्वाभाविक रूप से विकसित होने देने का आह्वान किया.

हिंदी के प्रति हीन भावना त्यागने का आह्वान

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) रामा कान्त शर्मा ने कहा कि हिंदी दिवस को मात्र औपचारिकता या अपनी भाषाई कमजोरी छिपाने का माध्यम नहीं बनाना चाहिए. हिंदी के प्रति हमारी जो हीन भावना है, उसे त्यागकर हमें अपनी भाषा पर गर्व करना होगा.

उन्होंने कहा कि बदलाव की शुरुआत ''हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा'' के संकल्प के साथ स्वयं से ही करनी होगी. 1935 में मैकाले द्वारा रोपे गये अंग्रेजी शिक्षा के पौधे ने हमारी मानसिकता को विदेशी आकर्षण और अंग्रेजी के प्रति झुकाव में जकड़ लिया है. 75 वर्षों बाद भी अगर हिंदी को उसका उचित महत्व नहीं मिल पाया है, तो इसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं.

धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ समापन

कार्यक्रम के अंत में डॉ. सुमन कुमारी ने सफल आयोजन के लिए सभी मंचासीन अतिथियों, प्राध्यापकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया. समारोह का समापन पूर्ण गरिमा के साथ राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान के गायन से हुआ.

इस अवसर पर महाविद्यालय के सभी सहायक प्राध्यापक, शिक्षकेतर कर्मी नितेश कुमार, कृष्णा कुमार, उमा शंकर आजाद, कर्मचारी राजू कुमार, रिभेष एवं छात्र जदयू प्रदेश महासचिव धर्मपाल राज, आशीष राज, पंकज कुमार समेत छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे. सभी ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभायी.

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