नालंदा की ज्ञान-परंपरा अतीत नहीं, वर्तमान की प्रेरणा : प्रो. सिद्धार्थ सिंह
नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय में आयोजित परिचर्चा में कुलपति प्रो सिद्धार्थ सिंह और लेखक प्रो आनंद सिंह
नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय में प्रो. आनंद सिंह की पुस्तक 'नालंदा एक गौरवशाली अतीत' पर विशेष परिचर्चा हुई. नालंदा को केवल अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि ज्ञान-दृष्टि और वैश्विक बौद्धिक विरासत का प्रतीक बताया गया.
Nalanda History: नव नालंदा महाविहार सम विश्वविद्यालय, नालंदा में शनिवार को लेखक प्रो. आनंद सिंह की चर्चित पुस्तक ‘नालंदा एक गौरवशाली अतीत’ पर विशेष पुस्तक परिचर्चा आयोजित की गयी. कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने की. परिचर्चा में नालंदा के इतिहास, समृद्ध ज्ञान-परंपरा, बौद्धिक विरासत और वैश्विक योगदान को केंद्र में रखते हुए विस्तृत विमर्श हुआ.
नालंदा ज्ञान-दृष्टि का प्रतीक
पुस्तक के लेखक प्रो. आनंद सिंह ने नालंदा की ज्ञान-परंपरा के विभिन्न आयामों पर विचार साझा किया. उन्होंने कहा कि नालंदा केवल ईंट-पत्थरों में दर्ज कोई प्राचीन अवशेष नहीं है, बल्कि भारत की उस व्यापक ज्ञान-दृष्टि का प्रतीक है, जिसने सदियों पहले दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से विद्यार्थियों, विद्वानों और शोधार्थियों को आकर्षित किया.
उन्होंने नालंदा की ऐतिहासिक विरासत के साथ भारतीय ज्ञान-परंपरा और समकालीन शोध की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला. प्रो. आनंद सिंह ने शिक्षकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों से संवाद करते हुए नालंदा के इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की.

इतिहास को वर्तमान शोध से जोड़ने पर जोर
प्रो. आनंद सिंह ने कहा कि नालंदा के अध्ययन को केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित रखने के बजाय उसकी ज्ञान-विमर्श की परंपरा, शोध-पद्धति और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संवाद को वर्तमान संदर्भों से जोड़ना आवश्यक है. उन्होंने कहा कि नालंदा की विरासत पर नए दृष्टिकोण से अध्ययन और शोध की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं.
नालंदा आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि नालंदा केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं, बल्कि ज्ञान, संवाद, विमर्श और वैश्विक बौद्धिक आदान-प्रदान की जीवंत परंपरा है. नालंदा की विरासत आज भी नई पीढ़ी को ज्ञान की व्यापकता और शोध की गहराई का संदेश देती है.
उन्होंने प्रो. आनंद सिंह की पुस्तक को नालंदा को समझने और जानने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बताया तथा उनकी शोधपरक दृष्टि की सराहना की. उन्होंने कहा कि ऐसे साहित्य से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखने और उसके विभिन्न पहलुओं को समझने की प्रेरणा मिलती है.
शिक्षकों और शोधार्थियों ने भी रखे विचार
परिचर्चा के दौरान विश्वविद्यालय के शिक्षकों और शोधार्थियों ने भी पुस्तक तथा नालंदा की ज्ञान-परंपरा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे. कार्यक्रम में नालंदा के ऐतिहासिक महत्व, उसकी बौद्धिक विरासत और वर्तमान समय में उसके प्रासंगिक पक्षों पर चर्चा हुई.
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