अतिक्रमण के दलदल में धंसता राजगीर, नदी-पइन, पोखर से लेकर विभागीय भूखंड तक कब्जे का साम्राज्य

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राजगीर रेलवे स्टेशन मोड़ के समीप लेदुआ पुल से पंडितपुर- दरियापुर तक जाने वाली पइन

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वैश्विक पर्यटक शहर राजगीर सरकारी और सार्वजनिक भूमि पर बढ़ते अतिक्रमण के गंभीर खतरे का सामना कर रहा है. यह केवल जमीन का मामला नहीं, बल्कि शहर की जलनिकासी, पर्यावरण और भविष्य की योजनाओं के लिए भी एक बड़ा संकट है.

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Rajgir encroachment: वैश्विक पर्यटक शहर राजगीर अतिक्रमण के ऐसे जाल में उलझ चुका है, जिसे काटना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. दशकों से सरकारी और सार्वजनिक जमीन पर धीरे-धीरे कब्जे होते रहे, लेकिन संबंधित विभाग समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं कर सके. नतीजा यह है कि आज राजगीर में सरकारी जमीन तलाशने से पहले यह देखना पड़ता है कि वह अतिक्रमण से बची भी है या नहीं. ऐतिहासिक, धार्मिक और पर्यटन की पहचान रखने वाले इस शहर में बढ़ता अतिक्रमण अब केवल जमीन का मामला नहीं, बल्कि शहर की जलनिकासी, पर्यावरण, यातायात और भविष्य की विकास योजनाओं के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है.

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मलमास मेला सैरात की भूमि हो या नदी-नाला, पइन-पोखर, गंगा सागर, नगर परिषद की जमीन अथवा राजगीर नगर निवेशन प्राधिकार की पुरानी भूमि, अतिक्रमण का दायरा लगातार बढ़ता गया है. पुरातत्व, वन, कृषि, शिक्षा और पथ निर्माण विभाग की जमीन भी इससे अछूती नहीं है. सरकारी भूखंडों पर अतिक्रमण का यह विस्तार बताता है कि लंबे समय तक भूमि की निगरानी, सीमांकन और नियमित सत्यापन की व्यवस्था प्रभावी नहीं रही है.

राजगीर की लोकभूमि पर अतिक्रमणकारियों का राज

राजगीर की प्राकृतिक जलधाराओं की स्थिति सबसे चिंताजनक है. वैतरणी नदी से लेकर लेदुआ पुल, पंडितपुर होते दरियापुर तक जाने वाली नदी की जमीन, अजातशत्रु किला के समीप से सटारी पुल होते नयी पोखर तक जाने वाली पइन तथा ठाकुरथान, अजातशत्रु नगर और बड़ी मिल्की होकर आगे जाने वाली पइन अतिक्रमण की मार झेल रही हैं. रेलवे और जिला परिषद की जमीन भी इससे अछूती नहीं है.

पइन और जलधाराओं के रास्ते सिकुड़ने का सीधा असर जलनिकासी पर पड़ता है. बारिश के दौरान जलजमाव की समस्या और गंभीर हो जाती है. प्राकृतिक जलनिकासी के रास्ते बाधित होने से इसका असर शहर की व्यवस्था पर भी पड़ता है.

अतिक्रमण के दलदल में धंसता राजगीर

सबसे बड़ा सवाल सरकारी जमीन की रखवाली को लेकर है. जिन विभागों के जिम्मे अपनी भूमि की सुरक्षा है, कई मामलों में वही अतिक्रमण हटाने को लेकर बेबस नजर आते हैं. नगर परिषद कार्यालय के समीप नगर परिषद की अपनी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने में हो रही परेशानी व्यवस्था की कमजोरी को उजागर करती है.

जब सरकारी संस्थान अपने कार्यालय के आसपास की जमीन की सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं, तो शहर के दूर-दराज इलाकों में स्थित सरकारी भूखंडों की निगरानी का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है.

फोटो - राजगीर रेलवे स्टेशन मोड़ के समीप लेदुआ पुल से पंडितपुर- दरियापुर तक जाने वाली पइन | Prabhat Khabar Network
राजगीर रेलवे स्टेशन मोड़ के समीप लेदुआ पुल से पंडितपुर- दरियापुर तक जाने वाली पइन

नगर परिषद और पुरातत्व विभाग के बीच जमीन का विवाद

फिलहाल नगर परिषद और पुरातत्व विभाग के बीच जमीन पर दावे को लेकर विवाद चर्चा में है. दोनों विभागों के दावों के कारण मामला उलझा हुआ है. इसे सुलझाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर पहल की जा रही है. उम्मीद है कि बुधवार तक विवाद का समाधान हो जायेगा.

लेकिन किसी एक भूखंड का विवाद सुलझ जाना राजगीर के अतिक्रमण की पूरी समस्या का समाधान नहीं है. असल चुनौती उन लोकभूमियों को बचाने की है, जो वर्षों से अतिक्रमण की चपेट में हैं.

लोकभूमि बचाने की चुनौती बड़ी

राजगीर की लोकभूमि को बचाने के लिए मलमास मेला सैरात सहित विभागवार जमीन का रिकॉर्ड तैयार कराकर स्थल पर सीमांकन, अभिलेखों का सत्यापन और अतिक्रमित भूमि की सूची सार्वजनिक करनी होगी. इसके बाद चरणबद्ध अभियान चलाकर अतिक्रमण हटाने के साथ मुक्त करायी गयी जमीन की सुरक्षा की स्थायी व्यवस्था भी करनी होगी.

केवल नोटिस, मापी और बैठकों से समस्या खत्म नहीं होगी. राजगीर की लोकभूमि बचाने के लिए अब कागजी कार्रवाई नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई जरूरी है.

अतिक्रमण के मुद्दे पर जनता बोली

गोलू यादव, पूर्व सचिव, युवा राजद, बिहार

राजगीर की पहचान पहाड़ों, नदियों, पइन, पोखर और ऐतिहासिक धरोहरों से है. सरकारी जमीन पर वर्षों से हो रहा अतिक्रमण शहर के भविष्य के लिए गंभीर खतरा है. प्रशासन को बिना भेदभाव अभियान चलाकर लोकभूमि मुक्त करानी चाहिए. अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई के साथ सरकारी जमीन की नियमित निगरानी भी सुनिश्चित होनी चाहिए.

सुधीर कुमार पटेल, पूर्व प्रखंड प्रमुख, राजगीर

राजगीर में अतिक्रमण आज की समस्या नहीं है, बल्कि वर्षों से चली आ रही लापरवाही का परिणाम है. पइन और जलस्रोतों पर कब्जे से जलनिकासी प्रभावित हो रही है. प्रशासन को पुराने नक्शे और अभिलेख के आधार पर जमीन का सीमांकन कराना चाहिए. लोकभूमि बचाना पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है.

डॉ. अनिल कुमार, वार्ड पार्षद, नप राजगीर

नगर परिषद क्षेत्र में सरकारी जमीन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. अतिक्रमण के कारण सड़क, यातायात, नाला और जलनिकासी व्यवस्था प्रभावित होती है. नगर परिषद को अपनी भूमि का सर्वे कराकर सीमांकन और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना चाहिए. जहां अतिक्रमण है, वहां निष्पक्ष कार्रवाई हो तथा भविष्य में दोबारा कब्जा न हो.

आशुतोष कुमार पाण्डेय, नगर अध्यक्ष, जदयू, राजगीर

राजगीर अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान रखता है. यहां सरकारी और सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण शहर की छवि को नुकसान पहुंचाता है. प्रशासन को सभी विभागों के साथ समन्वय कर संयुक्त अभियान चलाना चाहिए. कार्रवाई में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हो. अतिक्रमण हटाने के बाद जमीन की सुरक्षा भी जरूरी है.

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