बिहार में कैदियों के लिए खुला ‘नई जिंदगी’ का रास्ता, जेलों में क्लासरूम से कंप्यूटर लैब तक

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जेल की सांकेतिक तस्वीर। फोटो- AI Generated

बिहार की जेलों में अब कैदियों को सिर्फ सजा काटने तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि उन्हें नई जिंदगी के लिए तैयार किया जा रहा है. जेलों में पढ़ाई, कंप्यूटर ट्रेनिंग, वोकेशनल स्किल, योग और रोजगारपरक गतिविधियों के जरिए कैदियों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश हो रही है, ताकि रिहाई के बाद वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सकें और दोबारा अपराध की राह पर लौटने का खतरा कम हो.

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बिहार की जेलें अब महज कैद की जगह नहीं रह गई हैं. राज्य की जेलों में क्लासरूम, स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर लैब, लाइब्रेरी, वोकेशनल वर्कशॉप और योग-ध्यान जैसी गतिविधियों के जरिए कैदियों को रिहाई के बाद सामान्य जीवन में लौटने के लिए तैयार किया जा रहा है. जेल प्रशासन का फोकस अब सजा के साथ सुधार, शिक्षा, कौशल विकास और आत्मनिर्भरता पर है, ताकि कैदियों को समाज में सम्मानजनक तरीके से दोबारा जुड़ने का अवसर मिल सके.

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जेल के अंदर शिक्षा की नई पहल

इस बदलाव में शिक्षा को सबसे अहम साधन माना गया है। कैदियों को नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) और इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (IGNOU) के जरिए पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. इसमें स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के विकल्प शामिल हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की Prison Statistics India 2024 रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 24,050 कैदियों ने प्रारंभिक शिक्षा का लाभ उठाया. यह संख्या तमिलनाडु के 6,067 और उत्तर प्रदेश के 5,968 लाभार्थियों से काफी अधिक है. इसके अलावा 6,844 कैदियों ने वयस्क शिक्षा, 928 ने उच्च शिक्षा और 266 ने कंप्यूटर शिक्षा हासिल की.

इन चारों श्रेणियों को मिलाकर 2024 में बिहार के 32,088 कैदियों ने शैक्षिक कार्यक्रमों का लाभ उठाया. इसी अवधि में 7,387 कैदियों ने वोकेशनल ट्रेनिंग ली, जो देश के राज्यों में दूसरी सबसे बड़ी संख्या रही.

गृह विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में 1,256 कैदियों ने NIOS के जरिए 10वीं और 183 कैदियों ने 12वीं कक्षा के लिए नामांकन कराया. वहीं, 1,565 कैदी IGNOU के विभिन्न कार्यक्रमों से जुड़े, जिनमें 1,354 ने उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम शुरू किए है. कई जेलों में अब स्टडी सेंटर, स्मार्ट क्लासरूम, कंप्यूटर लैब और लाइब्रेरी की सुविधा उपलब्ध है.

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किताबों के साथ रोजगार का हुनर

जेल प्रशासन का जोर सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं है. मकसद यह भी है कि कैदियों को ऐसा हुनर मिले, जिससे वे जेल से बाहर निकलने के बाद अपने पैरों पर खड़े हो सकें.

वर्ष 2025-26 में 3,902 कैदियों को अलग-अलग ट्रेड में प्रशिक्षण दिया गया, जबकि 1,443 कैदियों ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (NIELIT) से जुड़े कार्यक्रमों के जरिए तकनीकी कौशल हासिल किया.

NIELIT पटना और जेल एवं सुधार सेवा विभाग के बीच हुए समझौते के बाद IT ट्रेनिंग को भी व्यवस्थित रूप दिया गया है. राज्य की 41 जेलों में कंप्यूटर लैब स्थापित या अपग्रेड की गई हैं. इसके लिए करीब दो करोड़ रुपये की लागत से 250 कंप्यूटर, UPS और फर्नीचर उपलब्ध कराया गया है.

प्रशिक्षण के दायरे में कंप्यूटर संचालन, टाइपिंग और इंटरनेट के इस्तेमाल के साथ अगरबत्ती व मोमबत्ती निर्माण, बकरी और मुर्गी पालन, वर्मीकम्पोस्ट, बिजली और प्लंबिंग, सिलाई, ब्यूटी सर्विस और मिथिला पेंटिंग जैसे काम शामिल हैं.

किशनगंज जेल में करीब 150 कैदियों को कंप्यूटर संचालन, अगरबत्ती-मोमबत्ती निर्माण, बकरी पालन और अन्य स्वरोजगार आधारित गतिविधियों की ट्रेनिंग दी गई है. भागलपुर की जेलों में कंप्यूटर साक्षरता और वर्मीकम्पोस्ट कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जबकि बांका जेल में कैदियों को किचन वेस्ट से जैविक खाद तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

AN सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के समाजशास्त्र एवं सोशल एंथ्रोपोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर बीएन प्रसाद के मुताबिक, रोजगार से जुड़ी गतिविधियां कैदियों में तनाव और हिंसक प्रवृत्तियों को कम करने में मदद कर सकती हैं. उनके अनुसार, कौशल के साथ जिम्मेदारी की भावना विकसित होने से कैदियों के लिए समाज में बेहतर नागरिक के रूप में लौटने की संभावना बढ़ती है.

मन और शरीर को भी सुधार की प्रक्रिया से जोड़ा

जेल सुधार कार्यक्रम में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को भी अहम स्थान दिया गया है. 'आर्ट ऑफ लिविंग' के साथ पांच साल के समझौते के तहत राज्य की सभी 59 जेलों में योग और ध्यान के सत्र आयोजित किए जा रहे हैं.

इनका उद्देश्य तनाव कम करना, आत्म-अनुशासन विकसित करना और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मदद करना है. इसको लेकर सभी जेलों में सुबह PT के साथ योग कराया जाता है. इसके लिए मास्टर ट्रेनर तैनात हैं और 'आर्ट ऑफ लिविंग' की ओर से कार्यक्रम का शेड्यूल उपलब्ध कराया जाता है.

इसके साथ ही IGNOU और NIOS के जरिए साक्षरता कार्यक्रम, NIELIT के जरिए कंप्यूटर ट्रेनिंग और जेल रेडियो जैसी पहल भी चल रही हैं. जेल रेडियो में कैदी खुद RJ की भूमिका निभाते हैं और उन्हें इसके लिए जेल के अंदर ही प्रशिक्षण दिया जाता है.

जेल से रोजगार तक का रास्ता

सुधार और पुनर्वास के प्रयासों के साथ खतरनाक अपराधियों के लिए सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है. दूर-दराज के इलाकों में हाई-सिक्योरिटी जेल बनाने और भागलपुर की शहीद जुब्बा साहनी सेंट्रल जेल में ओपन जेल विकसित करने की योजनाएं भी प्रस्तावित हैं. जेलों में मेडिकल सुविधाओं को मजबूत करने के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर अतिरिक्त मेडिकल स्टाफ की नियुक्ति भी की जा रही है.

अब कैदियों के लिए रोजगार के और व्यावहारिक अवसर तलाशे जा रहे हैं। जेल की खाली जमीन पर पेट्रोल पंप स्थापित करने का प्रस्ताव इसी दिशा में एक पहल है. योजना के तहत अच्छे व्यवहार वाले और लंबे समय से सजा काट रहे चुनिंदा कैदियों को बिक्री, कस्टमर सर्विस और अन्य बुनियादी कार्यों की जिम्मेदारी देने पर विचार किया जा रहा है. कैबिनेट की मंजूरी के बाद इसकी शुरुआत पूर्णिया सेंट्रल जेल से प्रस्तावित है.

बिहार की जेलों में यह बदलाव ऐसे समय हो रहा है, जब जेलों में भीड़भाड़, बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदी और रिहाई के बाद पुनर्वास जैसी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं. इसके बावजूद NIOS, IGNOU और NIELIT जैसी संस्थाओं की बढ़ती भागीदारी यह संकेत देती है कि जेल प्रशासन सुधार को महज एक अतिरिक्त गतिविधि के बजाय पुनर्वास की मुख्य प्रक्रिया के रूप में देख रहा है.

उद्देश्य साफ है कैदियों को जेल से बाहर निकलने से पहले शिक्षा, रोजगार योग्य कौशल और आत्मविश्वास देना, ताकि वे दोबारा अपराध की दुनिया में लौटने के बजाय आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ सकें.

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